दोस्तो मैं ना ही कोई लेखक हूँ, ना ही कोई कथाकार, ना ही कोई उपन्यासकार, ना ही कोई रचनाकार । हम चलेंगे उन गलियों, उन मोहल्लों, उन चौपालों में जहां हमने सुख, दुख, खुशी, गम, कसक, हास्य, व्यंग्य, चुटकले, आवेश, टीस, क्रोध, उल्लास, डॉट, डपट, उछलकूद, जीत, हार, सब कुछ साँझा करा था सब कुछ जिया था यारों, दोस्तों, परिवारों के साथ-साथ। इन्हीं लम्हों की यादों और दिल की बातों का ठिकाना हैं - गली + यारा = गलियारा

हर कहानी का अपना एक गलियारा।

Search

About

Your experience on this site will be improved by allowing cookies Cookie Policy