दोस्तो मैं ना ही कोई लेखक हूँ, ना ही कोई कथाकार, ना ही कोई उपन्यासकार, ना ही कोई रचनाकार । हम चलेंगे उन गलियों, उन मोहल्लों, उन चौपालों में जहां हमने सुख, दुख, खुशी, गम, कसक, हास्य, व्यंग्य, चुटकले, आवेश, टीस, क्रोध, उल्लास, डॉट, डपट, उछलकूद, जीत, हार, सब कुछ साँझा करा था सब कुछ जिया था यारों, दोस्तों, परिवारों के साथ-साथ। इन्हीं लम्हों की यादों और दिल की बातों का ठिकाना हैं - गली + यारा = गलियारा
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मैं न कोई लेखक हूँ, न कथाकार, न उपन्यासकार और न ही कोई रचनाकार। मैं तो बस उन गलियों, उन मोहल्लों और उन चौपालों की यादों का एक मुसाफ़िर हूँ, जहाँ हमने अपने जीवन के सबसे अनमोल पल जिए थे। वहीं जहाँ सुख-दुख बाँटे, हँसी के ठहाके लगाए, आँसू छुपाए, चुटकुले सुनाए, व्यंग्य किए, डाँट खाई, शरारतें कीं, हार का दर्द महसूस किया और जीत की खुशियाँ मनाईं। दोस्तों, यारों और परिवार के साथ बिताए वही छोटे-छोटे पल आज हमारी सबसे बड़ी पूँजी हैं। गलियारा उन्हीं एहसासों, यादों और दिल की बातों का ठिकाना है। यह केवल एक ब्लॉग नहीं, बल्कि एक ऐसा सफ़र है जहाँ हर लेख किसी याद से जुड़ता है, हर कहानी किसी अपने का एहसास कराती है और हर शब्द आपको उन गलियों तक वापस ले जाता है जहाँ ज़िंदगी सबसे खूबसूरत लगती थी। गली + यारा = गलियारा यही है मेरा परिचय, यही मेरी पहचान।
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