आज सोचता हूँ कि सुजानगढ़ की उस गली का नाम नयाबास क्यों रखा गया । संभवतः तालाब के आस पास रिहाइशों के बाद जब किसी पुराने जमाने में नयी आबादी जनसंख्या बढ़ने के कारण कस्बे के इस तरफ आई होगी तो यह नया + बास बना होगा ।
इसी गली में हमारा घर था जो कभी हमारे दादा जी ने बनवाया था । घर के तीन तरफ यानि सामने , दायें , बायें खुला कच्चा आँगन था । गली की सड़क कच्ची थी , नालियाँ कच्ची थीं । घर के अंदर दोनों तरफ शुरुआत में शौचालय थे जो ईंटों की दीवारों से बने थे परंतु न कोई छत न कोई दरवाजा, अंदर भी ईंटों की सीटें थीं । आपको संडास के लिए लौटा लेकर जाना होता था तथा बाहर लोटों को देखकर ही पता लगाना होता था कि कोई अंदर है या नहीं । जिसकी सफाई का जिम्मा जमादारणी का होता था जो सिर पर तसले में शौच रखकर लेकर जाती थी । घर के सामने के आँगन मे एक कुआं था जोकि नहाने धोने , बर्तन साफ करने, गरम पानी करने आदि कामों मे इस्तेमाल होता था ; घर के अंदर भी एक कुआं था जिसमें बारिश का पानी लिया जाता था साल में एक बार। बरसातों में घर की पूरी छत साफ करनी होती थी ताकि साफ पानी कुएं में लिया जाए जोकि चौके में खाने के लिए इस्तेमाल होता था । छत की सफाई का सारा कार्य मुख्यतया घर की महिलाओं के द्वारा किया जाता था । इस कुएं से पानी बाल्टी और रस्सी से खींचकर निकालना होता था । घर के अंदर पक्के आँगन में मूसल, पत्थर की हाथ से चलने वाली चक्की, तुलसा जी का पौधा का चौरा था । घर के बर्तन राख या बालू रेत से माँजे जाते थे ।
हमारे दादाजी एक समाजसेवी थे । उनका पहनावा सादगी भरा परंतु कठिन था पगड़ी, धोती सलीके से कुर्ते पर पहनना । दादाजी का सुबह औषधालय (जनता औषधालय) जाना, वहाँ पर अखबार पढ़ना, सब्जी लाना, सामाजिक कार्यों के लिए अपने दोस्तों से मिलकर आना दिनचर्या थी । उस मिट्टी की गाजर, टमाटर और मूली की मिठास अलग होती थी, राजस्थान की मिट्टी में मिठास है , यह बात अब समझ में आती हैं ।
1974/75 - 1 जुलाई को स्कूल खुलने का इंतजार सभी को बड़ी बेचैनी से रहता था क्योंकि दोस्तों , यारों की मौज मस्ती घर पर संभव नहीं थी । हालांकि मुझे याद आता है कि मेरे दोस्त देवेन्द्र और धर्मेन्द्र ऊंट गाड़ी ( जिसमें पीछे लोहे का जालीदार डब्बा होता था बैठने के लिए ) में बैठकर दूसरे स्कूल जाते थे । लेकिन जुलाई में मानसून के आने पर सड़कों पर और गली मे भयंकर पानी जमा हो जाता था और हम यारों के साथ इन गलियों में घुसे पानी को नदी समझकर पैदल पार कर के स्कूल जाते थे । सबसे बड़ी समस्या घर के अंदर आँगन में पानी और शौचालय का जलमग्न होना था । ऐसे में संडास जाने की कल्पना से ही दिमाग परेशान हो जाता था ।
यह गली मुख्यतया जैनियों की गली थी जहां हम भी उनके मंदिरों मे जाते थे और णमोकार मंत्र का जाप करते थे । दिगंबरी संतों का गली मे आवागमन रहता था और “है स्वामी तिष्ठों तिष्ठों आहार पानी शुद्ध हैं” हमारी जुबान पर भी बैठ गया था । जहां पर गली के पुरुष बाहर नौकरी या अपने व्यवसाय के लिए चले जाते थे अधिकतर आसाम में और महीने दो महीने के लिए सुजानगढ़ आते थे । हमारे दादाजी भी बताते थे कि उनका काम (कपड़े की दुकान) भी दिनाजपुर (बांग्लादेश) में था। लेकिन बंटवारे के बाद लगभग 1960 के आस पास सभी इधर आ गए थे। पिताजी ने ढाका यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद और काफी धन्धों में हाथ पैर मारने के बाद हापुड़ में नौकरी कर ली थी । आज यही सिद्धांत शायद मजदूर वर्ग फॉलो कर रहा हैं जहां पुरुष दिल्ली , मुंबई जैसे शहरों में रहकर अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए गाँव में धन भेजते हैं ।
सुबह बाखल (कच्चा खुला आँगन ) में कबूतरों के लिए बाजरा डालते थे और अक्सर कबूतरों के अलावा मोर और मोरनी भी आते थे । हमारी दादी और मम्मी रसोई का चूल्हा दो बार जलाती थीं अतः सुबह स्कूल जाते समय चाय के साथ रात के बने हुए टिकड़े (पराँठे) खाने को मिलते थे और टिफ़िन मे टिकड़ों के साथ मूंगफली की सूखी नमकीन चटनी या लाल मिर्च का भरवां अचार स्कूल के लिए मिलता था । स्कूल से वापिस आते हुए शहर के दो सिनेमा घरों का चक्कर लग जाता था । उस समय टीज़र के नाम पर पिक्चर हाल के शुरू में आने वाली फिल्म के गत्ते पर छोटे फोटो लगे होते थे, वही अपने आप में बड़ी बात होती थी, देखने के लिए । दादा जी और रिश्तेदारों से मिले पैसों मे से बचाए हुए पैसों से फिल्म देखने की व्यवस्था बड़ी मुश्किल से होती थी , शायद नीचे का टिकट ७५ या ८० पैसे का आता था। धक्का मुक्की से टिकट लेकर वो फिल्म देखने का आनंद बयान करना नामुमकिन है । हाँ , कभी कोई रिश्तेदार बाहर से आ जाए और ताँगे में बैठकर उनके साथ फिल्म जाने को मिल जाए और कोल्ड ड्रिंक पीने को , तो क्या कहना । ताँगे (घोड़ा गाड़ी) रेल्वे स्टेशन , बस स्टैन्ड और घंटा घर पर खड़े होते थे । ताँगेवाले को पहले बोलकर आना होता था, घर आने के लिए और वो पूरे ताँगे के दो रुपये लेते थे घर से पिक्चर हाल तक के लिए । उस दौर की यादगार फिल्में – धरमबीर, ड्रीम गर्ल, जूली, बॉबी, अमर अकबर एंथनी, जय माँ संतोषी, छोटा बाप, दीवार, मधुमती, यादों की बारात, शोले ,हाथी मेरे साथी आदि ।।
दादाजी का कमरा एकदम अलग घर की शुरुआत में आँगन के बाद दाहिनी तरफ घुसते ही था उसमें मार्बल दाने का चमकदार फर्श था और मोटा गद्दा था जिस पर एकदम सफेद चादर बिछती थी । कमरे में जाने की सख्त मनाही थी उसकी सफाई को ध्यान मे रखते हुए, कमरे में उनकी अलमारी मे उनका ट्रांजिस्टर था जिसकी सुई विविध भारती पर टिकी रहती थी। बड़े भाई को उस पर गाने सुनने का शौक था उनके पीछे से और सुई हिलने पर दादाजी को अगले दिन सुबह पहचानने में ज्यादा देर नहीं लगती थी । फिर डाँट डपट का सिलसिला चलता था । दादाजी की दूसरी अलमारी मे एल्युमिनियम का डिब्बा था जिसमे रेजगारी (सिक्के) रहती थी और तब हमे पाँच और दस पैसे मिलने पर जो खुशी होती थी वो बयान करना मुश्किल है । क्योंकि तब दस पैसे में फालरी (आलू चिप्स) , घंटी बजने वाले से कुल्फी, लाल छोटे बेर , पेटी वाली आइस क्रीम, अन पी की टॉफी कुछ भी ले सकते थे। हमारे पास उन सिक्कों का संग्रह आज भी है । कभी कभी खेजड़ियों पर खोखे (सूखी फलियाँ ) तोड़ने भी चले जाते थे , एकदम अलग स्वाद ।
दो जोड़ी कपड़े अपने आप मे पर्याप्त थे जब तक कि फट न जाए, उसके बाद नथु मल जी (दर्जी ) को बुलावा जाता था और फिर वो दो तीन दिन के लिए मेहमान की तरह आते थे । सामान्यतः एक ही कपड़े की दो शर्ट या एक ही कपड़े की दो पैंट सिली जाती थी । वो हमारे ड्रेस डिजाइनर थे जो सब की पसंद के कपड़े सिलते थे चाहे शर्ट हो , पैंट हो, ब्लॉउज हो , पेटीकोट हो या सलवार कुर्ती हो ।
देशाटन के नाम पर दो स्थान याद हैं एक सालासर और एक डूंगर , दोनों जगह हनुमान जी का मंदिर हैं , एक समतल भूमि पर और एक छोटी सी पहाड़ी पर । एक जगह तांगा और एक जगह ऊंट गाड़ी की सवारी याद हैं क्रमशः । आज सालासर धाम जग प्रसिद्ध हो गया हैं और सुजानगढ़ रेल्वे स्टेशन से लगभग २५ / ३० किलोमीटर दूर हैं । उस समय एकदम सामने से आराम से दर्शन होते थे । तीसरा ननिहाल।
यों तो गीली डंडा , सतोलिया , आइस पाइस , उंच नीच , छुपन छुपाई , क्रिकेट, कंचे, पतंग उड़ाना प्रचलित खेल थे लेकिन जो खेल माचिस के कवर फोटो को लेकर घरों की गॅलरी में खेलते थे और उन माचिस के कवर को ढूंढने के लिए भारी तपती गर्मी की दोपहरी में जाते थे वो आज भी याद हैं ।
अमीन सयानी जी बुधवार रात ८ बजे बिनाका गीत माला के चहेते सुपर स्टार थे और उनका इंतजार बेसब्री से होता था । उस समय यह रेडियो स्टेशन सीलोंन (श्री लंका ) से बजता था और हर उम्र के लोगों की इसके प्रति दीवानगी की क्या बात बोलूँ । सर्दियों में क्रिकेट मैचों की कॉमेंट्री लोगों की जान होती थी और वो भी पाँच दिवसीय क्रिकेट मैच ।
उस ब्लैक एण्ड व्हाइट दुनिया में रंगों की कोई कमी नहीं थी और आज इस रंगबिरंगी दुनिया की चका चौंध में मन और ज्यादा शानदार रंगों को तलाशता रहता है। उस जमाने में सम्प्रेषण का साधन पोस्टकार्ड और अन्तर्देशीय पत्र था क्योंकि उस समय ना कोई टेलिविज़न था, ना कोई मोबाईल, ना कोई वीसीआर । हमें पोस्टकार्ड पिताजी से मिलता था । जवाब में हमने सामान की एक लंबी लिस्ट उनको लिख दी । सुजानगढ़ में हम मंजन डाबर का काला वाला उंगली से करते थे अतः सीबाका पेस्ट और ब्रश की फरमाइश सबसे मजेदार थी और आज भी याद हैं ।
गली में पापड़ और बड़ी बनाने और खाने का शौक सभी को था अतः जिसके यहाँ पर भी पापड़ बनते थे वो १०० लोइयाँ दूसरे के घर पापड़ बनाने के लिए भेज देता था और उसमें से पाँच लोई वो रख सकता था । यह एक मिलकर चलने की प्रथा थी जो अब शायद खत्म है । इसी काम की वजह से बर्तनों पर परिवार के मुखिया के नाम की खुदाई होती थी क्योंकि समाज में खाने की चीजों के आदान प्रदान की परंपरा थी । खास बात यह है कि कच्चे पापड़ की लोई और कच्ची बड़ी का स्वाद (चोरी चोरी खाने की वजह से )आज भी मुंह के अंदर विद्यमान है ।
उस समय रिश्तेदार जैसे बुआ, उनके बच्चे, बड़िया जी (ताई जी ), बहनें , महीने दो महीने के लिए रहने आते थे और कई बार उनके बच्चे दूसरी जगह अच्छी पढ़ाई , अच्छे इलाज या किसी और वजह से घर में सालों रहते थे । उस समय किसी के यहाँ जाने के लिए पहले उसे बताना नहीं होता था । लेकिन घर और दिल दोनों छोटे नहीं थे , सामान्यता राजस्थान में बिस्तर के लिए बहुत बड़े और मोटे गद्दे कमरे के फर्श पर ही बिछते थे जिन पर एक साथ चार या पाँच आदमी सोते थे । हमारे दादा जी की सगी बहन बाल विधवा थी और वो अंत में बीमार होने से पहले, हमारे साथ सुजानगढ़ में रहती थी , वो पापा जी की भुआ थी और सभी उन्हें बरजी भुआ जी कहते थे । गर्मियों में शाम को आमरस बनता था चूंकि कोई मिक्सी घर में नहीं होती थी अतः जूट के कपड़े के एक हिस्से को किसी निचली खिड़की के लोहे के डंडे से बांध देते थे और दूसरे हिस्से को हाथ से पकड़कर , झूला सा बनाकर आम को काटकर रगड़ रगड़ कर माँ दूध और पानी डालकर रस निकालती थी । भुआजी की बेटी बताती है कि उन गुठलियों को चूसने के लिए हम आँगन में मिलने की आस से चक्कर लगाते रहते थे । शाम का चूल्हा लगभग पाँच बजे जलता था और दादा जी के खाने के बाद सभी खाना खा लेते थे । उसके बाद घर के सामने की तरफ लगभग १५० डिग्री दाएं कोण पर एक लकड़ी का बड़ा तख्त जैनियों के घर के बाहर बिछा/डला था , जिस पर पूरी गली की औरतें , बच्चे, लड़कियाँ सब अपनी पूरे दिन भर की खबरें लेकर बैठते थे और खुल कर चर्चा करते थे । जिससे पूरे दिन की थकान गायब हो जाती थी । उसके बाद घर मे बरजी भुआ जी की धार्मिक और पौराणिक कहानियाँ जिन्हें वो ज्ञान की बातें कहती थीं , सुनने को मिलती थीं , उनकी वाणी में एक अलग मिठास थी ।
अब बारी आती थी सोने की , राजस्थान में बिजली उस समय कम आती थी । बालू रेत गरम भी जल्दी होती थी और ठंडी भी जल्दी लेकिन गर्मियों में बाखल (घर का कच्चा आँगन ) में पहले पानी का छिड़काव किया जाता था , उसके बाद बीच की नाली के दोनों तरफ खाटें बिछाई जाती थीं । आकाश नीला होता था और आसमान में तारे साफऔर नजदीक दिखाई देते थे , सप्तऋषि मण्डल को पहचानना , चलते हुए राकेटों को ढूँढना , टूटे हुए तारों से कुछ मांगना यह सब खाट पर मुलायम चादरों के साथ सोने तक के सामान्य खेल थे ।
सर्दियों का नजारा अलग था, सुबह दादाजी बाखल यानि बाहर का चूल्हा जला देते थे भगोने में गरम पानी के लिए , जब कोई भी उसमें से गरम पानी लेता था वह ठंडा पानी डाल देता था, ऐसी हिदायत थी । शाम को बाहर की मस्ती के बाद घर में घुसते ही हाथ पैर गरम पानी से धोने होते थे , उसके लिए एक कुंडी में गरम पानी डाल दिया जाता था । उसके बाद जो छोटी सिगड़ियाँ मिट्टी की होती थी उनमें चूल्हे के बचे हुए कोयले मम्मी डाल देती थी जिन्हें कमरों में लेकर बैठ जाते थे या उस पर सूँसा रोटी (बाजरे की पुरानी रोटी को अंगीठी (सिगड़ी) के कोयले पर रखकर उस पर सरसों का तेल लगाया जाता था और मंदी मंदी आंच पर सिकती रहती थी ) बनती रहती थी । उन्हे रजाइयों में बैठकर सबके साथ खाने का मजा अलग था ।
घर की कच्ची जगह में भिंडी, बाजरा, मक्का, पपीता, गंवार और सेम की बेलें बहुत कुछ लगता था और अच्छी उपज होती थी । बाजरे के सिट्टे भूनकर खाए जाते थे । यों तो राजस्थान का लोकप्रिय खाना - केर और सांगरी, एवं गट्टे की सब्जी है , पर घर में विशेष पर्व पर केर सांगरी की सब्जी, मूंग दाल का हलवा , मूंग दाल की पकोड़ी, विशेष व्यंजन बनाए जाते थे । कस्बे में तालाब के पास सारे मेले लगते थे ।
दादी ने घर में बकरी पाल रखी थी जिसे सुबह रेवड़ के लिए छोड़ने जाता होता था और शाम को लेने के लिए । यह रेवड़ हमारी गली से दो गली के बाद जाता था अतः शाम को बकरी लेने के लिए आगे जाकर मंदिर के पास इंतजार करना होता था, गोधूलि के समय बकरियों के आने की धूल (बकरी धूलि) दूर से दिखाई देती थी । एक बार वहाँ पहुँचने में देर हो गई और रेवड़ आगे चला गया । घर खाली हाथ लौटने पर दादा जी से जो दुर्गति हुई , शुक्र है भगवान का कि बकरी घर आ गई । उनकी डिलीवरी (जापा) का काम दादी और ममी करती थी , हम तो उनके बच्चों (मेमनों) को कभी कभी रजाइयों में लेकर सो जाते थे ।
सुजानगढ़ का रेलवे उस समय छोटी लाइन से जुड़ा था, एक ट्रेन सुबह दिल्ली से आती थी उसी से लोगों को ब्रेड का पता चला । हालांकि हमने कभी नहीं खाई थी । घर के ठीक सामने वाले घर में एक डॉक्टर परिवार किराये पर रहने आया उनके दो बच्चे एक लड़का एक लड़की हमारी उम्र के थे । वो शहर के पढे लिखे और संस्कारी थे । पहली बार पता चला कि २५ दिसंबर पर सांता क्लॉज़ टॉफी ,चॉकलेट गिफ्ट तकिये के नीचे देकर जाता है ।
बड़े भाई साहब (मदन लोहिया) का कहना है , " मेरा भी बचपन सुजानगढ़ में ही बीता और वहां की तमाम यादें जैसे कि हर इंसान के साथ होता होगा, आपके बचपन की यादें हमेशा आपका पीछा करती रहती है शायद वह आपकी बहुत बड़ी पर्सनल असेट्स होती है।
खास तौर पर जब आप एक कस्बे से निकल के उत्तर प्रदेश के बड़े कस्बे में और फिर एकमहानगर गाजियाबाद , दिल्ली जैसी और बाकी जगह रहने लगते हैं तो आपके दिलो दिमाग पर एक तुलनात्मक पत्र तैयार हो जाता है , क्या था वहां पर जो यहां पर नहीं है , क्या था हमारे बचपन में जो हमारे बच्चों के बचपन में नहीं है, बचपन में बचपन था, किताबें और पढ़ाई थी लेकिन उसके अलावा भी बहुत कुछ थाऔर जो उस वक्त नहीं था वह था मोबाइल ,टेलीविजन, सही मायने में मोहल्ले का पता वहीं पर लगता था क्योंकि गली के सभी लड़के मिलकर साथ खेला करते थे क्रिकेट ,गिल्ली ,डंडा ,बैडमिंटन ,फुटबॉल सब कुछ वहीं पर और खेला ।
अद्भुत जीवन था , जब पड़ोसियों के साथ कुंड का बरसाती पानी भी SHARE होता था, पड़ोस के घर में खेलते वक्त उनके यहां उनके बच्चों के साथ खाना खाना कुछ भी अजीब सा नहीं लगता था , पूरी दुपहरी पड़ोस के घर में ताश खेला करते थे, नंगे पांव छत पर पतंग उड़ाया करते थे और ट्यूबलाइट के शीशे को पीसकर मांझा रंगा करते थे, राम रहीम और राजा इकबाल के छोटे-छोटे उपन्यासों का बेसब्री से इंतजार होता था और हाँ वह जो चुस्की बर्फ में वो रूह अफजा वाली और वह पांच पैसे में मिलने वाली फालड़ी जिसको आज हम अंकल चिप्स कहते हैं एक मीठी चटनी के साथ जिसमे लास्ट में बची हुई चटनी को कागज पर से भी चाटने की इच्छा होती थी और फिर घर में किसी अच्छे रिश्तेदार का आ जाना और भरी दोपहरी में कुल्फी के लिए हां भर देना , तब कुल्फी वाले की टन टन घंटी की आवाज अचूक होती थी और कभी-कभी तो कुल्फी वाले के पास से बर्फ में लगे हुए टमाटर भी खाने का मौका मिल जाता था, कुछ रिश्तेदार जिसमें चाचा और एक फूफा शामिल है अपने सिर में से सफेद बाल निकलवाने के लिए भी पैसे देते थे और चाचा तो अपने पैर दबाने के लिए, कमर दबाने के लिए और उसके अलावा भी पैसे देते थे उन मिलने वाले पैसों का आनंद अलग ही था, हर संडे की संडे दादा जी 5 या 10 पैसे देते थे 50 पैसे तो शायद तभी मिलते थे जब कोई मेला होता था. सोने की जगह को मैदान में ठंडा करने के लिए 20+छोटी बाल्टी पानी, कुए से पानी निकाल कर, डालना एक आम काम था और इसी तरह से दादा-दादी के पैर दबाना शाम को सोने से पहले सामान्य काम था। हां एक चीज का नाम नहीं सुना था जिसको आजकल हम पॉल्यूशन या प्रदूषण कहते हैं शायद ही कोई घर था जिसमें टू व्हीलर या फोर व्हीलर होता था ।
हां एक घटना अभी याद है कि क्लास में रोशनी कम थी और बल्ब के लिए पैसे इकट्ठे किए जा रहे थे तो बहुत से छात्र हमसे बहुत ही धनवान परिवारों के थे लेकिन पुरजोर कोशिश यही रहती थी कि सबसे ज्यादा पैसे मैं ही दूं एक और अजीब घटना घटी थी क्लास 8 में जिसमें अलग-अलग छात्रों को अलग-अलग सीटों पर बिठाने के लिए लकी ड्रा हुआ और यह शायद दुनिया का अद्भुत संयोग था कि जो हम चार दोस्त साथ बैठा करते थे उनको फिर से साथ ही बैठने के नंबर निकले । सुजानगढ़ का सही में नहीं भूलने वाला स्थान जीवन में था, है, और रहेगा. "
राजस्थान की माटी – धरती है रीति रिवाजों की, धरती है लोक गीतों की, धरती है ओढनी की, धरती है लाल पीले पहनावे की, धरती है शांत संस्कृति की । मुझे गणगौर की पूजा जो गली में काफी दिनों चलती थी और शायद तालाब पर मेला लगता था की कुछ कुछ याद हैं । नमन हैं इस धरा को जहां हमारा बचपन बीता ।
हमारी बड़ी बहिन जोकि एक बहुत पढ़ने वाली मेधावी छात्रा ( गांधी बालिका विद्यालय) थी, को हमारी पढ़ाई का जिम्मा था । उन्ही की बदौलत हम दोनों भाई भी कक्षा मे प्रथम आते थे । उन्होंने हायर सेकन्डेरी बहुत अच्छे अंकों से पास किया और आगे पढ़ना चाहती थी परंतु हमारे दादाजी ने मना कर दिया । उस समय हमें इस बात की कोई महत्ता पता नहीं थी । उनकी शादी तय कर दी गई पास के छोटे से कस्बे ताल छापर में । जीजाजी बताते है कि उनके खेल के शौक थे दौड़ना (रेस) , निसरणी, धोरो में पैदल चलना, कंचे, पतंग उड़ाना। ताल छापर आज अपनी ओपन मृग सेंकचूरी के लिए विख्यात है । १९७८ हमारे लिए सुजानगढ़ से हापुड़ पलायन के लिए तय हुआ क्योंकि दीदी की शादी हो गई थी, भाई का हाई स्कूल हो गया था और मेरी सातवी कक्षा पास हो गई थी । घर का कुछ हिस्सा किरायेदार मास्टर जी को दे दिया था जो घर की देखरख अच्छे से करते थे ।
चलिए दोस्तों आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ जानी पहचानी, कुछ अनजानी , कुछ सुनसान गलियों में , मोहल्लों में , एक नए शहर , नए देहात, नए कस्बे , नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ । तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन ।
Leave a comment
Your email address will not be published. Required fields are marked *
