भीगा-भागा मुंबई और पिघलता मॉनसून (Mumbai in Monsoon Mood)
मुंबई, भौगोलिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए बहुत ही माफिक जगह है, ताकि सामान का आवागमन जल मार्ग द्वारा आसानी से दूसरे देशों के साथ किया जा सके। मुंबई – सपनों का शहर, संघर्षों का नगर, रात-दिन चलती-फिरती डगर। मेरा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से शाम 4.55 बजे तेजस राजधानी एक्सप्रेस से मुंबई का सफर शुरू होता है। मुंबई लगभग 8.30 बजे पहुँचती है, लेकिन मुंबई आने से पहले ही मानसून में , आपको हरे-भरे पहाड़, नदियाँ, पानी के स्रोत, संकरी खाड़ियाँ कुछ अलग एहसास करा देंगे।
18.8.2026
सुबह 8.35 बजे मैं मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर था। बिटिया मुझे लेने रेलवे स्टेशन आ गई थी। बाहर निकलते ही मुंबई की जान काली-पीली टैक्सियाँ खड़ी थीं, जिन्हें देखते ही आपको कलकत्ता की याद आ जाएगी। बिटिया का फ्लैट मुंबई में है और फ्लैट की खिड़की से फ्लाईओवर साफ दिखाई देता है। आसमान में बादल आ रहे थे, जा रहे थे। बारिश जब मन कर रहा था, भिगो जाती थी। खिड़की से नीचे का ट्रैफिक भी दौड़ता दिख रहा था, लगातार चलती जिंदगी, जो कह रही हो कि चलते रहो, चलना ही जिंदगी है, मंजिल या सपनों को हासिल करने के लिए, बारिश हो या तूफान। (फोटो नीचे देखें।)

1. फ्लैट से नीचे का नज़ारा
अगले दिन सुबह हम निकल गए वास्तु संग्रहालय के लिए। पहले हमने चेम्बूर के लिए काली-पीली ऑटो ली। उसके बाद वहाँ से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के लिए लोकल ट्रेन (धीमी गति वाली) ली। ट्रेनों के समय निर्धारित हैं, जिन्हें आप ऐप से फॉलो कर सकते हैं, क्योंकि सबके लिए टाइम महत्वपूर्ण है। सच कहा है, मुंबई की लोकल वहाँ की लाइफलाइन है, जैसे दिल्ली की मेट्रो। उसके बाद इसका साथ निभाते हैं काली-पीली टैक्सी वाले और ऑटो वाले।
हमने फर्स्ट क्लास का टिकट लिया, ताकि आराम से बैठ सकें। इस श्रेणी के डिब्बों के स्थान के मार्गदर्शन के लिए प्लेटफॉर्म पर खंभों पर लाल और पीले रंग की तिरछी, चौड़ी-चौड़ी लाइनें प्रिंट होती हैं। हमें ट्रेन के कुछ दूर चलते ही बैठने के लिए सीट मिल गई। बाहर आपको दोनों तरफ स्लम भी दिख जाएंगे। मुंबई की 50% आबादी स्लम में रहती है और इन्हीं भाइयों ने अपने कंधों पर मुंबई को उठा रखा है, या यूँ कहें कि मुंबई को यही चला रहे हैं, गर्मी हो, सर्दी हो, बरसात हो या तूफान हो। यह हमारे आभार के पात्र हैं।
थोड़ी ही देर में छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (CSMT) आ गया, जो एक ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन है, जिसे 1887 में बनाया गया था। इसकी वास्तुकला ब्रिटिश गोथिक और पारंपरिक भारतीय शैलियों का संगम है, जहाँ दीवारों पर फूल, जानवर, कलाकृतियाँ हैं। (फोटो नीचे देखें।)

बाहर निकलते ही दाहिनी तरफ बहुत ऊँची BMC की इमारत भी इसी का नमूना है। (फोटो नीचे देखें।)

ठीक सामने आराम वड़ा पाव वाला है, जो पुर्तगालियों द्वारा मुंबई को खाने (वड़ा पाव, जिसमें आलू का तला हुआ बोंडा कच्चे पाव के बीच रखकर दिया जाता है) के लिए दिया हुआ यादगार तोहफा है। यहाँ से लेकर जब आप गेटवे ऑफ इंडिया तक जाएंगे, तो सड़क के दोनों तरफ पुरानी इमारतों में आपको गोथिक आर्च वाले प्रवेश दिखाई देंगे, जो काफी खूबसूरत लगते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इस इलाके को देखकर लंदन, इटली की याद आ जाती है।
हमने कैब ली और आ गए छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय (CSMVS), जिसे पहले प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूज़ियम कहा जाता था। प्रवेश करते ही बाईं तरफ इसके इतिहास की जानकारी है। दाहिनी तरफ महात्मा बुद्ध की विशाल प्रतिमा। यहीं से आपको अंदाजा हो जाएगा कि अंदर कुछ खास है। (फोटो नीचे देखें।) 
टिकट लेकर अंदर प्रवेश किया तो भूतल पर प्राचीन मूर्तियाँ (विशेषतया - ब्रह्माजी और शेष शय्या पर विष्णुजी की मूर्तियाँ, कलाकृतियाँ, पुराने इतिहास को दर्शाते बर्तन आदि हैं। (फोटो नीचे देखें।)



प्रथम तल पर इमारत अंदर से बेहद खूबसूरत है, जिसको देखकर लगता है कि रखी हुई चीजें ही दुर्लभ नहीं हैं बल्कि यह इमारत भी एक धरोहर है ।

जहाँ भारतीय पेंटिंग विशेष तौर पर राधा कृष्ण के मिलन , रामायण का चित्रण , तिब्बत और नेपाल की गैलरी है। (फोटो नीचे देखें।)


दूसरे तल पर यूरोपीय चित्रकला, चीनी और जापानी मिट्टी के बर्तन, प्राचीन अस्त्र और वस्त्र कला की गैलरी मौजूद है। जब आप बाहर आएंगे तो इस प्राचीन म्यूज़ीअम की इमारत आपको मंत्रमुग्ध कर देगी।

यहाँ से हम चल दिए गेटवे ऑफ इंडिया के लिए, जो काफी नजदीक है। विशाल समंदर और किनारे पर शांत और अटल खड़ा गेटवे ऑफ इंडिया, एकदम सही नाम दिया गया है—समुद्री रास्ते से भारत में आने वालों का स्वागत करता हुआ द्वार। (फोटो नीचे देखें।)

यहाँ से आपको एलीफेंटा द्वीप पर गुफाएँ देखने जाने के लिए फेरी मिल जाएगी। मानसून की वजह से फेरी का परिचालन बंद था। परंतु मेरे मानस पटल पर आज भी इसकी सुंदर छवि अंकित है, अतः यह समुद्री यात्रा अवश्य करनी चाहिए, जो रोमांचक है और उसके पश्चात गुफाओं में भगवान शिव, नटराज, अर्धनारीश्वर आदि की बहुत प्राचीन प्रतिमाएँ हैं। हिचकोले खाती लहरों के बीच यह द्वीप प्रकृति का एक नैसर्गिक तोहफा और अनुभव है, जो आपको बहुत लुभावना लगेगा।
गेटवे ऑफ इंडिया से समुद्र का नज़ारा, लहरों का उछलना, जहाजों का आना-जाना, किनारे-किनारे पैदल मस्त चलना आपको मानसून में बहुत भाएगा। साथ ही दाईं तरफ पर्यटकों का स्वागत करने वाला होटल ताज है, जो खूबसूरत होने के साथ-साथ 26/11 की टीस की भी याद दिला देता है। (फोटो नीचे देखें।)

हमने वहाँ से काली-पीली टैक्सी ली गिरगाँव चौपाटी के लिए, लेकिन गर्मी की वजह से वहाँ ज्यादा नहीं घूम पाए। मुंबई का मानसून एकदम धूप-छाँव की तरह है। पता चला कि एक स्पॉट पर आपको बारिश मिल रही है, तो दूसरे स्पॉट पर आपको अच्छी-खासी धूप मिल जाएगी।
दोपहर का समय था। हम चौपाटी के सामने सुख सागर रेस्टोरेंट में खाने के लिए चले गए, ताकि मुंबई के खाने का स्वाद लिया जाए। पाव भाजी और डोसा ऑर्डर किया गया। (फोटो नीचे देखें।) वहाँ से हम कैब में सी लिंक, वर्ली वाली साइड होते हुए चेंबूर आ गए।

अगले दिन लगभग 2 बजे की लोकल ट्रेन के लिए मैं ऑटो लेकर घाटकोपर स्टेशन आ गया। बिटिया ने मुंबई वन ऐप डाउनलोड कर दिया था, जिससे आप आसानी से टिकट बुक कर सकते हैं। वहाँ से मैं टिटवाला वाली लोकल ट्रेन लेकर चल दिया शहड के लिए। यह रास्ता बड़ा दिलचस्प है। आपको ठाणे के आसपास से स्थानीय क्रीक (संकरी खाड़ी), मुंब्रा की समुद्री खाड़ी और उसके बाद उल्हास नदी और कई नदियाँ मिलती हैं, जो मानसून में आकर्षक लगती हैं। मेरा दोस्त संतोष रावत मुझे रेलवे स्टेशन लेने आ गया था।
जब आप मुंशी प्रेमचंद, अमृतलाल बेगड़, महादेवी वर्मा और पुराने लेखकों को पढ़ते हैं, तो कई बार आपको लगता है कि आप भी नदी के किनारे किसी गाँव में जाकर बस जाएँ, जहाँ आप दूर से भी नदी को निहार सकें और पास जाकर मन की बात भी कर सकें।
गगनचुंबी इमारतों के बीच उसने भूतल पर बनी पार्किंग में गाड़ी लगा दी और हम लिफ्ट से उसके फ्लैट के लिए चल दिए, जो शहड में 16वें तल पर है। लिविंग रूम में बैठे और जैसे ही बालकनी से बाहर झाँका, तो मैं हैरान रह गया। सोसाइटी की बाउंड्री से लगी हुई उल्हास नदी इठलाती हुई जा रही थी। चूँकि नदी के दोनों तरफ 100 मीटर के दायरे में आप कोई विकास कार्य नहीं कर सकते हैं, अतः दोनों तरफ खूब पेड़-पौधे और हरियाली, जो मानसून में लहलहा रही थी। (फोटो नीचे देखें।)

जीवंत, प्राकृतिक और शांत वातावरण, चेंबूर की खिड़की से चलती-फिरती मुंबई से एकदम जुदा और अलग। दोस्त ने नया फ्लैट लिया था, जिसे पूरे करीने से उनकी बिटिया, जो इंटीरियर डेकोरेटर है, अपने हाथ से सजाया था। खाने-पीने का शौक रखने की वजह से भाभी जी ने बड़ा पाव, स्पेशल चीज के छोटे-छोटे समोसे, बेसन की चक्की—सभी मेरी मनपसंद और स्वादिष्ट चीजें—रखीं। बेतकल्लुफी की वजह से मैंने उन्हें कड़क चाय और पाव को सेकने के लिए बोल दिया। लाजवाब स्वाद था और इतने दिन से मैं अच्छे बड़ा पाव की तलाश भी कर रहा था। (फोटो नीचे देखें।)
सोसाइटी में सभी सुविधाओं के साथ स्विमिंग पूल, रेस्टोरेंट, मंदिर, गुरुद्वारा, सैलून, सब कुछ है। हम टहलने चल दिए नदी की तरफ। जैसे ही पेड़ों की झुरमुट वाली सड़क पर चले, लगभग 1.5 से 2 फुट का पतला-सा साँप हमारे आगे से निकलकर पौधों में चला गया। नदी का पानी मानसून की वजह से थोड़ा मैला हो गया था। सोसाइटी के पार्क भी बहुत सुंदर हैं। वहाँ से हम चल दिए उसके ऑफिस, मार्केट आदि घूमने के लिए। शहड बिरला जी की सेंचुरी कॉटन फ़ैक्टरी की वजह से बसा हुआ एक छोटा-सा टाउन है, जो मुंबई की भीड़ से अलग होने की वजह से तेजी से विकसित हो रहा है। बाजार में सिंधी समुदाय का आधिपत्य है।

रात्रि में सादा दाल, रोटी, ग्वार की फली की सब्जी, लिसोड़े (गूँदे) का अचार, पापड़—सात्विक भोजन लिया और उसके बाद थोड़ा टहलकर मंदिर और गुरुद्वारे के दर्शन किए। घर आकर हम तीनों खो गए अपने मेरठ प्रवास के दिनों में, पुरानी न भूलने वाली यादों में। साथ में अप्सरा की अमरूद की आइसक्रीम मिर्च के मसाले के साथ मस्त लग रही थी।
अगले दिन सुबह हम नहा-धोकर निकल गए टिटवाला श्री क्षेत्र के दर्शन करने के लिए। जैसे ही आप शहड की सरहद पार करके निकलते हैं, वर्षा ऋतु में दोनों तरफ का हरा-भरा नज़ारा दिलकश और लुभावना लगता है। रास्ते में आप उल्हास नदी को पार करते हैं। (फोटो नीचे देखें।)

हरियाली भरे रास्ते के बाद आप पहुँच जाते हैं टिटवाला के प्राचीन सिद्धि विनायक मंदिर, जहाँ कहते हैं कि कभी कण्व ऋषि की दत्तक पुत्री शकुंतला ने दुष्यंत के लिए गणेश जी की पूजा की थी। जैसे ही हम मंदिर के दर्शन करके निकल ही रहे थे, अचानक बहुत तेज टपाटप बारिश शुरू हो गई। कुछ देर इंतजार करने के बाद बारिश रुक गई। (फोटो नीचे देखें।)

हम बाहर निकलकर विट्ठल राधा मंदिर के दर्शन के लिए निकल गए। वहाँ से बरसात के बीच ही हम आ गए मंगलमूर्ति स्नैक्स वाले के यहाँ। दोस्त ने मिर्ची पकौड़े, बड़ा पाव, मिसल पाव, चाय ऑर्डर करके मँगवा लिया। भीगे-भीगे मौसम में गरमागरम स्वादिष्ट पकवान और चाय, एक बेहतरीन नाश्ता। (फोटो नीचे देखें।)

टिटवाला की संक्षिप्त एवं दिलकश यात्रा के बाद हम वापस शहड लौट रहे थे। रास्ते में बारिश की झिरमिर-झिरमिर, उल्हास नदी का पुराना पुल, हरियाला वन क्षेत्र, ताज़गी भरी हवा। मेरे दोस्त ने बताया कि इधर से भी इगतपुरी के लिए रास्ता जाता है, जिसे मुंबई वाले दिल्ली वालों की मसूरी की तरह लेते हैं।
लगभग एक साल पहले, मैं पत्नी के साथ, इसी दोस्त की एक बिटिया की शादी के लिए दिल्ली से नासिक होते हुए आए थे। हम ट्रेन से नासिक उतरे थे, जहाँ हमने टैक्सी वाले को बुला रखा था और हमने ड्राइवर को बताया कि सीधे ज्योतिर्लिंग त्र्यंबकेश्वर मंदिर ले चले। जो कि नासिक रेलवे स्टेशन से लगभग 28 किलोमीटर दूर ब्रह्मगिरी पर्वत की तलहटी में है।
ड्राइवर ने गाड़ी मंदिर से पहले एक तरफ लगा दी। फिर हमने समय के अभाव को देखते हुए 200 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से दर्शन पास के टिकट ले लिए। सबसे पहले हम चल दिए कुशावर्त कुंड (पवित्र तालाब) में स्नान के लिए, जहाँ गोदावरी नदी का जल है। (फोटो नीचे देखें।) स्नान के बाद कपड़े बदलने के लिए शुल्क देकर भी चेंजिंग रूम की व्यवस्था है। यह कुंड मंदिर से लगभग 400 मीटर दूर है। इसके बाद हम त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु पैदल चल दिए। त्रिमुखी शिवलिंग के प्राचीन मंदिर में प्रवेश के बाद थोड़ा दूर से दर्शन होते हैं। लेकिन मंदिर के अंदर का आभामंडल अलौकिक और मन-चेतना को छूने वाला है। यह एकदम अलग एहसास है। (फोटो नीचे देखें।)
यहाँ से हम चल दिए इगतपुरी के लिए। बहुत सुहाना सफर, मनोरम मंज़र, हरी-हरी वादियों का रास्ता, बीच-बीच में लुभावने झरने हैं और रास्ते में आपको वैतरणा बाँध भी मिलेगा, जो मुंबई को पानी और बिजली की सप्लाई करता है। इसके इर्द-गिर्द और इगतपुरी के आसपास कई हिन्दी फिल्मों की शूटिंग हुई है। शादी में शामिल होने और समयाभाव के कारण हम ज्यादा नहीं घूम पाए। परन्तु यहाँ कैमल वैली, भाटसा नदी घाटी, घंटादेवी का मंदिर आदि घूमने लायक और दर्शनीय स्थल हैं, मुख्यतः मानसून में। (फोटो नीचे देखें।)
यादों के ऊपर वाले सफर (एक साल पहले) से वापस और टिटवाला से वापस घर आकर, चाय पीकर, रावत जी ने मुझे ऑफिस जाते हुए शहड रेलवे स्टेशन पर लोकल के लिए छोड़ दिया। मैंने 11 बजे की धीमी गति की शिवाजी टर्मिनल की लोकल ले ली। मुंबई में यह समय ट्रेन में कम भीड़ का होता है। खाली ट्रेन में खिड़की वाली सीट मिल गई। बीच-बीच में बारिश की फुहारें अंदर भिगो रही थीं, काले-काले घनघोर मेघ, कहीं पर समुद्री खाड़ियाँ, कहीं-कहीं हरे-हरे पहाड़—सब हसीन था।
शनिवार का दिन था। बारिश हो चुकी थी। मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर के दर्शन के लिए जाना था, अतः सुबह जल्दी उठ गए, हालाँकि आरती के दर्शन के हिसाब से लेट थे, जो सुबह 5.30 बजे होती है। हम सुबह सात बजे मंदिर पहुँचकर प्रसाद, फूल लेकर लाइन में लग गए। बाहर जूते, सामान आदि रखने की व्यवस्था है। लाइन में चलते-चलते पता चला कि इस लाइन में 100 रुपये का टिकट है और वरिष्ठ नागरिकों और 12 साल तक के बच्चों को छूट है। मैंने बिटिया का एक टिकट लिया और आगे बढ़ गए। मुंबई का बहुत प्राचीन एवं मान्यता प्राप्त सिद्धि विनायक गणेश जी का मंदिर है। दर्शन करने के पश्चात प्रांगण में दो चाँदी के मूषक हैं, जिनके कान में आप अपने मन की बात कह सकते हैं। (फोटो नीचे देखें।)

तत्पश्चात हम चल दिए माटुंगा की ओर। मुख्य सड़कें खुली-खुली, सरपट दौड़ती काली-पीली टैक्सी में सुबह-सुबह की ताजी हवा अंदर आ रही थी। बीच-बीच में बरसात के छींटे भी घुस रहे थे, क्योंकि मौसम भीगा-भागा था।
माटुंगा में रामआश्रय में दक्षिण भारतीय नाश्ता करने के लिए बाहर लंबी लाइन लगी हुई थी। छुट्टी का दिन था। लोग-बाग अपनी मॉर्निंग वॉक पूरी करके दक्षिण भारतीय खाने का लुत्फ लेने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। हमने इडली, सांभर वड़ा, फ़िल्टर कॉफी ली। स्वाद के जायके के बाद पता चला कि बाहर लाइन क्यों लगी हुई थी। यहाँ के डोसे की विभिन्न वैरायटियाँ, रसम, मैसूर पाक, बादाम शीरा, पाइनऐपल शीरा भी प्रसिद्ध हैं। (फोटो नीचे देखें।)

रविवार की सुबह थोड़ी धीमी चलती हुई रहती है। फ्लैट के पास ही घाटकोपर में केवल सीनियर सिटिज़न के लिए नाना-नानी पार्क है। मैं सुबह-सुबह निकल गया वॉक पर, ब्रेड-बिस्किट लेकर। सड़क के दोनों तरफ लाल गुलमोहर, अशोक, अमरूद, पीपल, पीला गुलमोहर, नारियल के पेड़, पाम के लंबे-लंबे पौधे, चंपा, चमेली आदि वनस्पतियों के घने पुराने दरख्त, नए-नए पेड़-पौधे।
इन पेड़ों पर मस्ती करते हुए तोते, काँव-काँव करते हुए कौए, सामान्य एवं सफेद कबूतर, चहकती हुई गिलहरियाँ, बुलबुल, ग्रीन लंबे पंखों वाली दुर्लभ चिड़िया, फुदकती हुई गौरैया। कौए बिस्किट चाव से पानी में भिगोकर खाते हैं। बिल्लियाँ भी बहुत ज्यादा हैं। अचानक बारिश आ गई। चलो, छाता साथ में था।
फ्लैट से बारिश का वीडियो
दोस्तों, अभी मैंने मुंबई के एक जरा-से टुकड़े की बात की है, जहाँ आपको लगेगा कि आप उसी भीड़-भाड़ वाली मुंबई में ही हैं या कहीं और। ऐसे ही एक और इलाके में, मैं आपको ले चलूँगा, जहाँ आप मुंबई लोकल या मेट्रो से पहुँचकर हैरान रह जाएंगे कि यह कोई हिल स्टेशन है या मुंबई का ही एरिया।
तब तक के लिए अभिवादन।
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