मनोरम पहाड़ी गाँव तोलियों (पौड़ी गढ़वाल) का सुहाना सफर – ऑफ बीट पीकॉक होम स्टे के साथ
AWESOME OFF BEAT NATURE TRIP TO VILLAGE TOLLIYON WITH PEACOCK HOME STAY
10.09.2026/11.09.2026
ट्रेन का दिल्ली से चलकर कोटद्वार पहुँचने का समय 3.55 था परंतु ट्रेन लगभग सुबह 3.35 बजे पहुँच गई मैंने 3.40 सुबह का अलार्म लगा रखा था। इस सफर के चार मुसाफिर थे – मैं, बड़े भाई (मदन लोहिया), उनके दोस्त और उनकी बिटिया। उठते ही मैंने रवींद्र भैया (टैक्सी ड्राइवर – ब्रिज ट्रेवल्स, कोटद्वार) को फोन कर दिया उन्होंने कहा कि आप चाय वगैरह लो , मैँ आ रहा हूँ। चार बजे के बाद हम रवींद्र भैया की एरटिगा में चल पड़े अपनी गढ़वाली यात्रा के लिए। हमने सोचा रेलवे स्टेशन की बजाय खुले में चाय लेंगे, आप जैसे ही कोटद्वार से निकलते हैं - चारों तरफ घना और शांत जंगल, शुद्ध हवा। हमने रवींद्र भैया को बोल दिया कि जहाँ भी चाय की दुकान मिले , रोक देना। यह भी पता चला कि कोटद्वार के आसपास हाथियों, भालू, टाइगर आदि के कारण प्रशासन रात्रि यात्रा पर समय समय पर प्रतिबंध लगा देता हैं जिसे सुबह खोला जाता है।
लगभग 6 बजे हम गढ़वाल भोजनालय, गुमखाल, जहाँ पहले से कुछ गाड़ियाँ रुकी थीं , रुक गए चाय के लिए। थोड़ी देर में पता चला कि आगे तो लेंड स्लाईड की वजह से ट्रैफिक जाम है और ठीक होने में समय लगेगा, गुमखाल से सतपुली तक सड़क चौड़ी करने का काम चल रहा है। थोड़ा घूमने चले तो इतना खूबसूरत बादलों के बीच हरे भरे पहाड़ों का पौ फटने से पहले सूर्योदय का नजारा (फोटो नीचे देखें )।
1. गुमखाल पौ फटने से पहले का नजारा
कभी कभी शायद ईश्वर कुछ करता है तो अच्छा ही करता है । गुमखाल के नजारे भी अलग हैं पता चला कि गढ़वाल के पहाड़ बहुत कच्चे हैं इसलिए हरियाली भी बहुत ज्यादा है। नागिन की तरह बलखाती घुमावदार सड़कें, सीढ़ीनुमा खेत, बादलों की लुका छिपी, बहुत कम ट्रैफिक।
2. सीढ़ीनुमा खेत और हरे भरे रास्ते - फोटो सौजन्य से सुरेन्द्र शर्मा जी (भैया के दोस्त)
रास्ते में जगह जगह चाय पीते पाते हम पहुँच गए चौबट्टाखाल, वहाँ से हमने टमाटर, खीरा, प्याज, फल, दही आदि खरीद लिया। लगभग 3 किलोमीटर चलने के बाद हम पहुँच गए हूलाकीखाल जहाँ बहुगुणा जी सड़क पर मोटरसाइकिल लेकर हमारा इंतजार कर रहे थे । उन्होंने बताया कि उनका गाँव तोलियों / पीकॉक होम स्टे सड़क से लगभग 700 मीटर दूर सामने वाली पहाड़ी के पीछे है (फोटो नीचे देखें )। थोड़ी ढलान और रास्ता देखकर लगा कि होमस्टे में जाया जाए या नहीं, या कैंसिल कर दिया जाए। परन्तु अंत में निर्णय लिया गया कि आज रात तक का स्टे यहीं किया जाए।
3 . पीकॉक होम स्टे का खूबसूरत ट्रैक - दाहिनी पहाड़ी के पीछे
बहुगुणा जी ने मोटर साइकिल पर हमारा सामान और सवारी भी छुड़वा दी और गाड़ी सड़क पर खड़ी करवा दी, लेकिन मैंने और भैया के दोस्त की बिटिया ने ट्रैकिंग पैदल की और समझ में आया कि यह ट्रैकिंग इस होम स्टे की सबसे रोमांचक और सुहानी ऑफ बीट है। इस छोटे से शांत गाँव तोलियों (ब्लॉक खिरसू – जिला पौड़ी गढ़वाल) में कुल 12 घर हैं जिसमें से एक बहुगुणा जी का घर/ होम स्टे है, सामान्य एवं हवादार साफ सुथरे कमरे, कच्चा आँगन, चारों तरफ प्रकृति ने दिल खोलकर अपनी छटा, अपनी खूबसूरती बिखेरी हुई है, ठीक सामने हिमालय की पर्वत शृंखलाएं, घर में लौकी, तोरई, टमाटर, हरी मिर्च, करेला,कद्दू, मूली, धनिया, पुदीना, सेव, आड़ू, नाशपाती, काफल, आम, मक्का सभी तरह के पौधे लगे हुए, सामने थोड़े से एरिया में मंडवे की खेती। (फोटो एवं वीडिओ नीचे देखें)।
4.5.6 - होम स्टे से हिमालय का नजारा, सब्जियों का आँगन, होम स्टे से सुबह का विडिओ
सुबह से हमने नाश्ता नहीं किया था और समय भी लगभग 12 बज गए थे अतः सर्वसम्मति से यह निर्णय हुआ कि पहले नहा धोकर नाश्ता कम लंच किया जाए जिसके लिए हमारे पास भरवां पराँठे, थेपले, आलू गोभी की सब्जी, प्लेन पराँठे, अचार, हरी चटनी आदि थे इसलिए पहले अपना खाना खत्म करने का निर्णय लिया। बहुगुणा जी ने अपने घर की बनी हरी चटनी, अचार दिया जो बेहद स्वादिष्ट था। खाना खत्म करते ही बारिश शुरू हो गई अतः पहले आराम और इस जगह की शांति और प्रकृति से बातचीत करने का मन हुआ।
थोड़ा विश्राम के बाद उठे तो देखा घर के खुले आँगन में कालकण्ठ (Black headed Jay), जंगल बैबलर (seven sisters) बुलबुल, घूघूती(spotted dove) प्लेट में परोसा खाना बिना डर के खा रही थीं , उन्हे मैंने नमकीन भुजिया परोसी जो बड़े चाव से उन्होंने खाई । बहुगुणा जी की बिल्ली मनु और पड़ोसियों के झबरीले डॉग जिमी और शेरु भी आ गये। डॉग भी मस्ती से दिया गया बिस्किट खा रहे थे।
बारिश के बाद शाम से पहले सामने हिमालय की चोटियों के पास शानदार और दुर्लभ इंद्रधनुष बन गया और दिन बन गया (विडिओ नीचे देखें )।
7. दुर्लभ इंद्रधनुष का विडिओ
यहाँ पर कोई खूबसूरत बाग नहीं था परन्तु जरूरत के हिसाब से कायदे से बहुगुणा जी ने सभी कुछ लगाया हुआ था जो इसकी नेचुरल ब्यूटी को बयां कर रहा था जहाँ दैनिक दिनचर्या की सभी चीजें थीं। मौसम की ठंडक और माहौल को देखते हुये पकोड़ियों की फरमाईश की गई । बहुगुणा जी ने अपने खेत के ताजा धनिया, पुदीना और हरी मिर्च को मिलाकर आलू प्याज की शानदार और क्रिस्पी पकोड़ियाँ बनाकर खिलाई। समझ में आ गया कि बहुगुणा जी के हाथ में खाने का जादू है। एक साथी के लिए पहले बिना प्याज की पकोड़ियाँ निकाली गईं।
8. होम स्टे में पकोड़ियों का स्वाद
शाम को भाई के दोस्त गाँव में टहलते हुये गए तो उन्हें एक मधुर आवाज सुनने को मिली तो पता चला कि वह शिवानी रावत है जो गढ़वाली गीत गाती हैं, यू ट्यूब पर उनका चैनल है संगीत की कोई शिक्षा दीक्षा नहीं, केवल दिल और आत्मा बोलती है। शाम को उन्हें आने का निमंत्रण दिया गया। उनके गढ़वाली गीतों ने समा बांध दिया, उभरता हुआ सितारा, इतनी दिलकश, सुरीली आवाज और एक दर्द।
9. शिवानी रावत के साथ एक शाम
शाम के पहाड़ों का होम स्टे से हर पल बदलता हुआ व्यू, भीगी भीगी तन्हाईयां, गहन शांति, विहंगम पहाड़ों की शृंखलाएँ, प्रकृति की गोद में बसे हुये इस अनछुए गाँव में रहना इतना दिलकश, मनोरम हो सकता है यकीन नहीं था ।
10. शाम को सुनहरी पहाड़ियाँ - फोटो सौजन्य से बहुगुणा जी
रात्रि भोज में बहुगुणा जी ने स्वादिष्ट राजमा दाल, पहाड़ी हरी पत्तियों की भुजी, हरी चटनी और उनकी पत्नी सरोज जी ने चूल्हे की मंड़ुवा और गेहूं की मिक्स रोटियाँ गरम गरम खिलायी तो सफर की सारी थकान दूर हो गई। उँगलियाँ चाटने वाला खाना।
11. सरोज बहुगुणा जी के द्वारा गरम गरम चूल्हे की रोटियाँ
पूरी रात लगातार बारिश कभी तेज, कभी मंद, सुबह भी बारिश, सारा आसमान, पहाड़ बादलों से घिरे हुये, मन में संशय कल घूमने के लिए कैसे जाना होगा ।
12.09.2026
चाय वगैरह पीकर सोचा गया कि जब तक बहुगुणा जी नाश्ता तैयार करते है हम थोड़ा सड़क तक (700 मीटर) घूमकर और चौबटा के बाजार से दही, बिस्किट सामान ले आते है। सभी ने छतरियाँ लेकर सफर शुरू किया। मेरा मन इस 700 मीटर में केवल दुर्लभ पक्षियों के दर्शन के लिए और प्रकृति के अनमोल नजारों के लिए रहता था, जो इस छोटी सी पगडंडी (ट्रैक) में आपको अक्सर मिल जाएंगे, घुमावदार और थोड़ा-सा ऊंचा नीचा रास्ता बहुत लुभावना है।
12. ऑफ बीट ट्रैक से दुर्लभ नजारा
सड़क तक आते ही सब की छतरियाँ बंद हो गई। रवींद्र भैया (ड्राइवर) ने सुझाव दिया कि चलो धारीदेवी, देवलगढ़ चलते हैं, अभी तक कोई भी नहाया धोया नहीं था। हम चल पड़े और बहुगुणा जी को फोन कर दिया कि नाश्ता आकर कर लेंगे।
खिरसू को पार करके जैसे ही थोड़ा आगे चले तो लैंड स्लाइड और रास्ता जाम। ऐसे में ही मौका मिल पाया पहाड़ी लोगों से बातचीत का, पता चला कि उत्तराखंड में सबसे ज्यादा पलायन पौड़ी गढ़वाल से हुआ है, नई जनरेशन खेती नहीं करना चाहती है, रोजगार के साधन सीमित हैं। घरों में बुजुर्ग हैं जिन्हें अपने पहाड़ों, घर से लगाव है चाहे जितना मर्जी संघर्ष हो या सुविधाओं का अभाव। इन पहाड़ों ने इन्हें इतना अटल, संतोषी, हिम्मतवाला बना रखा है जो सीखने वाली बात है। परन्तु, परेशानी में जीती जिंदगियाँ, पहाड़ कह रहे हैं कि कहीं मत जाओ, मैंने अपने आपको उपजाऊ और सिंचाई के पानी के स्रोतों से सम्पन्न रख रखा है, इतनी शांति इतना सुकून कहीं नहीं मिलेगा, तकनीक कह रही है कि मोबाइल हाथ में लेकर नीचे चले जाओ।
जेसीबी ने रास्ता क्लियर कर दिया और हम बढ़ गए, आगे एक खूबसूरत गाँव मिला - कोठगी जो एक पहाड़ी पर बसा हुआ है (फोटो नीचे देखें)।
13. कोठगी का विहंगम दृश्य
एकदम हरे-हरे पहाड़ निस्तब्ध, आसमान को छूते हुए, हर पल अलग रूप दिखाते हुए, बादलों का लगातार आना-जाना, शांत समीर, रुकने से ज्यादा चलने में मजा आ रहा था। तभी आ गया देवलगढ़, जो अपने आप में एक इतिहास लिए हुए है। कहते हैं कि हिमालय से आए राजा देवल ने इस जगह को बसाया और कई मंदिर बनवाए, तभी इसका नाम देवलगढ़ पड़ा। कालांतर में गढ़वाल के राजा अजयपाल ने अपनी राजधानी चाँदपुर गढ़ी से देवलगढ़ में स्थानांतरित करवायी और अपनी कुलदेवी राजराजेश्वरी का मंदिर और सुरंगें बनवाईं। इसी पहाड़ी पर 11वीं और 12वीं शताब्दी के गौरादेवी और लक्ष्मीनारायण के मंदिर हैं। (फोटो नीचे देखें)
14,15,16- देवलगढ़ के प्राचीन मंदिर और पूजा
उसके बाद हम चल दिए बद्रीनाथ मार्ग पर धारा देवी मंदिर के दर्शन हेतु जो अलकनंदा नदी के मध्य में स्थित है। हमें कोटद्वार से लेकर सतपुली, खिरसू होते हुए यहाँ तक का मार्ग लगभग बिना किसी भीड़भाड़ और ट्रैफिक के मिला जोकि दुर्लभ है। यहाँ पर काली माँ के चेहरे / मुख की पूजा की जाती है। मान्यता है कि माँ दिन में तीन बार अपना रूप बदलती हैं – सुबह एक बालिका, दोपहर में युवती और रात्रि में वृद्धा। कहते हैं इनके दर्शन के बिना चार धाम यात्रा अधूरी मानी जाती है। (फोटो नीचे देखें)
17. धारीदेवी का मंदिर
दोपहर का समय था शाकाहारी भोजन के लिए, हम पास में ही शांतिकुंज रिज़ॉर्ट के नेगी रेस्टोरेंट में चले गए और सात्त्विक भोजन का आनंद लिया। उसके बाद हम चल दिए घर वापसी की ओर। मेरी इच्छा थी कि रास्ते में बुघाणी - हेमवती नंदन बहुगुणा जी का घर/संग्रहालय देखते हुए चले। छोटे से गाँव में बना हुआ एक बड़ा सा घर, उनके आजादी के योगदान, मुख्यमंत्री रहते हुए विकास कार्यों, सादे जीवन के बर्तन, वस्त्र, पालकी, पत्र आदि की गाथा कहते हुए मिलते हैं। कई घरों में ताले लटके हुए हैं। जो सरकार को आगाह कर रहे हैं, हालांकि सरकार ने नारा दे रखा है “चलो गाँव की ओर” बस कोई मुहिम छेड़नी होगी। (फोटो नीचे देखें) यहाँ पर भी दुर्लभ पक्षियों के दर्शन।
18, 19 - हेमवती नंदन बहुगुणा जी का घर और संग्राहल्य में राखी पालकी
उत्तराखंड सरकार ने जगह-जगह वाचिंग टॉवर बनाए हुए हैं जहाँ बैठकर आप शांति से प्राकृतिक नज़ारों का लुत्फ ले सकते हैं। कोठगी में पहुंचकर हम टॉवर पर चढ़कर शीतल पेय और दोस्त की बिटिया की बनाई उपमा का आनंद ले रहे थे वादियों के बीच तभी मेरे मुँह से निकला कि हिमालयन रेंज के दर्शन नहीं हुए जैसे ही मुड़कर देखा तो बर्फाच्छादित हिमालयन रेंज हमारी आँखों के सामने, अलौकिक, अकल्पनीय, अद्भुत (फोटो नीचे देखें)।
20, 21 - वाच टॉवर और उनसे हिमालय दर्शन
शाम को लौटते हुए भाई ने खिरसू GMVN में बुकिंग की स्थिति पता किया और हम वापस अपने घर / होम स्टे आ गए। आज रात्रि में बहुगुणा जी ने घर की लौकी की सब्जी बना रखी थी, सुबह की आलू की सब्जी भी रखी थी, पनीर की सब्जी बनवा ली और उनकी पत्नी ने चूल्हे की गरम गरम मंडवे की मिस्सी रोटी के साथ हमें नीचे बिठाकर खिलाई। हवा, पानी, मिट्टी की ताजगी से बना खाने का स्वाद बिल्कुल अलग बिल्कुल जुदा। (फोटो नीचे देखे)। सुजानगढ़ की बचपन की याद आ गई जब हमें माँ रसोई के बाहर नीचे बैठाकर चूल्हे का गरम खाना खिलाती थी।
22. सरोज जी ने नीचे बिठाकर गरम खाना खिलाया
रात होने तक आसमान बिल्कुल साफ, तारों से लदा हुआ, बचपन की याद दिलाता हुआ जब बाखल में खाटों पर लेटकर तारे देखते रहते थे।
13.09.2026
सुबह उठकर देखा तो नीचे से ऊपर जाते हुए बादलों को देखकर लगा जैसे नई नवेली दुल्हन इठलाती हुई गगरी भरकर जा रही हो। सुबह-सुबह आँगन में चिड़ियाओं (विशेषतया कालकण्ठ, गौरैया, घुघुती, बुलबुल, जंगल बैबलर) की उछलकूद, डॉगी को बिस्किट, खारी खिलाने के बाद तय हुआ कि नाश्ते का कुछ सामान बहुगुणा जी के साथ जाकर ले आता हूँ। मुझे इच्छा थी कि 700 मीटर की उस पगडंडी की आखिरी यात्रा हो जाए ताकि दुर्लभ पक्षियों और नज़ारों के दर्शन हो जाएँ। बहुगुणा जी के साथ मोटरसाइकिल पर 3 किलोमीटर का चौबट्टा तक का खुली हवा का सफर, नगण्य ट्रैफिक, कभी-कभी दुर्लभ पक्षियों के सड़क पर दर्शन के लिए गाड़ी को रुकवाना, घुमावदार रास्ते, पहाड़ियों से बहता प्राकृतिक पानी, रोमांचक सफर, बयान करना मुश्किल, लुत्फ लीजिए। लौटते में लंगूर सड़क पर थे।
घर आकर सरोज बहुगुणा जी के साथ मिलकर खुले आँगन में चूल्हे पर उपमा, आलू के सैंडविच (जिसका मसाला बहुगुणा जी ने पहले ही तैयार कर रखा था) बनाना, चूल्हे पर सेकना, पहाड़ी हरी चटनी और चाय के साथ खिलाकर और खाकर मजा आ गया। (फोटो नीचे देखे)।
23. सरोज जी के साथ मिलकर सुबह का नाश्ता चूल्हे पर
आज हमारा विदाई का दिन दूसरी पहाड़ी खिरसू के लिए।
अतिथि देवो भवः सुना था लेकिन आज दो दिन के साथ में हमनें यहाँ महसूस किया। जब आप घूमने निकलते हैं तो भौतिक सुविधाओं को दरकिनार करते हुए यदि आपको प्रकृति, सच्चे लोग, आत्मीय व्यवहार, सादा जीवन मिल जाए तो आप धन्य हैं और मेजबान धन्यवाद और बधाई के पात्र हैं।
महँगे होटलों में आप मानवीय संवेदनाओं के साथ-साथ जमीनी हकीकत से जुड़कर घुमक्कड़ी का लुत्फ नहीं ले सकते हैं और ना ही आप उस माहौल, परंपरा, खान-पान, रहन-सहन, तौर-तरीकों आदि से जुड़ सकते हैं। अगर आपको ऐसा पारिवारिक माहौल चाहिए जहाँ लगे कि आप निश्चिंत होकर, शहर की आपाधापी, शोरगुल, भीड़भाड़ से दूर, हसीन तन्हाइयाँ, सुकून के साथ रह सकें तो बहुगुणा परिवार का यह पीकॉक होम स्टे, तोलियों इस छोटे से गाँव का सर्वोत्तम ऑफबीट स्थान है जहाँ सादगी भरा जीवन, पहाड़ की सोंधी-सोंधी महक, हवा की ताजगी, आत्मीय व्यवहार, प्रदूषण-मुक्त, घर के खेत की सब्जियाँ और अगर आपको बर्ड वाचिंग का शौक है तो यह इलाका जन्नत है।
24. फुरसत के क्षण
25. घुमक्कड़ी के सरताज - मदन लोहिया
इस सारी घुमक्कड़ी और रिसर्च का श्रेय जाता है मेरे बड़े भाई साहब (मदन लोहिया) को जिनकी जिज्ञासा और मेहनत से यह संभव हो पाया और जो सबकी हर चाहत का ख्याल रखते हैं।
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