कनाताल की कैनोपी और सुरकंडा देवी का 360 डिग्री हिमालयन व्यू
Canopy of Kanatal and 360 degree Himalayan view from Surkanda Devi
मेरे दोस्त केदार सिंह तोमर ने अपने बेटे की शादी के लिए निमंत्रण भेज दिया। पाँच मार्च को देहरादून में शादी थी। बहुत दिन से देहरादून जाने का मन था और चूँकि हम मुजफ्फरनगर में एक कमरे में साथ रहे थे, अतः मैंने आने के लिए हाँ बोल दिया। उसने होटल में रहने की व्यवस्था कर दी थी, जहाँ शादी के कुछ फ़ंक्शन थे। मुझे याद आ गया कि उसकी खुद की शादी में लगभग 40 साल पहले हम मुजफ्फरनगर से गए थे। पहले देहरादून, फिर विकासनगर, फिर वहाँ से मैं और मेरा एक और दोस्त चकराता के लिए चले। बड़ी मुश्किल से आख़िरी बस मिली थी और अंदर से बस खचाखच भरी हुई थी। हमें ऊपर बैठना पड़ा। बस की यह पहली इतनी खतरनाक यात्रा थी ... नीचे देखो तो खाई! किसी तरह दूसरे लोगों को पकड़कर वहाँ पहुँचे तो जान में जान आई। मुझे आज भी याद है, उसकी बारात चकराता से एकदम नीचे नदी के किनारे एक गाँव में गई थी।
4 मार्च 2025
मैंने जाने के लिए ट्रेन के टिकट बुक कर दिए थे – शताब्दी एक्स्प्रेस – गाज़ियाबाद से ट्रेन चली और रुड़की पहुँचकर वापस ट्रेन सहारनपुर आई, फिर हरिद्वार होते हुए देहरादून पहुँची। हम (सपत्नीक) रेलवे स्टेशन से सीधे होटल पहुँच गए। फिर उनके घर पहुँचकर मेहंदी के फ़ंक्शन में शामिल हो गए। पूरा पहाड़ी माहौल था। उसके घर की छत से देहरादून का नज़ारा बहुत खूबसूरत था। (फोटो नीचे देखें।)
नृत्य की एक अलग परंपरा, दुंदुभि से बजाना, चारों तरफ रंगीन आलम था। घर के बाहर पार्क में खाने-पीने की सब व्यवस्था थी। शाम को होटल आकर हमारे पास समय था, तो अपने पुराने साथी यशपाल राजपूत जी से मिलने, उनके घर जो पास में था, चले गए। शाम को हम वापस पहाड़ी संगीत में शामिल हो गए। अलग-अलग तरह का ग्रुप डांस, मस्त, एकदम अलग। सुर्ख लाल, पीले, हरे रंग के कपड़ों में माहौल एकदम रंगीन लग रहा था। सबसे बड़ी बात, पहाड़ी नृत्य बहुत तेज नहीं किया जाता, बल्कि धुन और संगीत के आधार पर चलता है। एक अलग ही माधुर्य या मिठास है इस नृत्य की परंपरा में।
5 मार्च 2025 - हम होटल में तैयार होकर उसके घर पर सुबह का नाश्ता करके देहरादून भ्रमण के लिए निकल गए। उनकी कॉलोनी में ही एक टैक्सी वाले को बुला लिया और चल दिए। सबसे पहले चल पड़े टपकेश्वर महादेव। गाड़ी मंदिर से काफी पहले एक गली में ही खड़ी करनी पड़ी। वहाँ से पैदल अंदर गए। कोई मेला लगा हुआ था। पानी की अविरल बहती धारा के मध्य शिवलिंग के दर्शन, प्यारा दृश्य था। वहाँ से चल पड़े सहस्त्रधारा के लिए, जो अपने गंधक के झरनों और जल स्रोत के लिए प्रसिद्ध है। आप वहाँ आराम से स्नान का लाभ ले सकते हैं। सुंदर जगह और देहरादूनवासियों के लिए खूबसूरत हॉलिडे डेस्टिनेशन। वहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर भी हैं (फोटो नीचे देखें)
उसके बाद हम चल दिए मशहूर एफ़आरआई (FRI), जो अपनी वन्य जीव, वानिकी की रिसर्च की पढ़ाई के लिए जाना जाता है। विशाल प्रांगण और कैंपस, अद्भुत वास्तुकला का नमूना, खुले लंबे-चौड़े मैदान, कई फिल्मों का शूटिंग स्थल। आपको बहुत खूबसूरत लगेगा। तत्पश्चात निकल गए मानसी डियर पार्क, जो ऊँचे-नीचे घुमावदार रास्तों और पहाड़ी के बीच बना हुआ लुभावना ज़ू है। रात को शादी पहाड़ी रीति-रिवाज़ों से सादगी से संपन्न हुई और बहुत मज़ा आया।
6 मार्च 2025
अगले दिन सुबह हमने टैक्सी वाले को होटल ही बुला लिया था और हम चल दिए मसूरी की ओर। जैसे ही आप देहरादून पार करने वाले होते हैं और मसूरी मोड़ शुरू होता है, चढ़ते ही कुछ देर बाद आपको सड़क के दोनों तरफ अच्छे रेस्टोरेंट मिल जाएंगे, लेकिन जल्दी सुबह कम ही खुले थे। अतः हम असली पप्पू ढाबे पर रुक गए, जो मालसी डियर पार्क से पहले है। आपके आराम के लिए प्रवेश से पहले स्वागत के लिए खाटें बिछा रखी हैं। अंदर रेस्टोरेंट साफ-सुथरा और स्वादिष्ट खाने वाला था। हमने नाश्ते में आलू का पराँठा, दही और गरम चाय ली। (फोटो नीचे देखें।)
हम लोग लँढौर की तरफ चल पड़े, जो कि मशहूर लेखक रस्किन बॉन्ड के निवास स्थान के लिए भी जाना जाता है। आपको वहाँ पहुँचने से कुछ पहले ही पता चल जाएगा कि भीड़-भाड़ से दूर यह जगह बहुत शांत और रमणीय है। यहाँ पैदल घूमकर आपको बहुत मनभावन लगेगा। हम प्रसिद्ध चार दुकान पर पहुँचे, जहाँ हमने बैठकर चाय-नाश्ता लिया। पास में ही खूबसूरत चर्च है। हाँ, एक मशहूर बेकरी भी है, जहाँ अंदर बैठने के लिए लंबी लाइन लगी रहती है। (फोटो नीचे देखें।)
लौटते हुए हम आ गए लाल टिब्बा पर, जो अपने छोटे-से कैफ़े के लिए मशहूर है। सीढ़ियाँ चढ़कर जब हम खुली छत पर पहुँचते हैं, तो आप वहाँ भी बैठकर खुले में चाय, कोल्ड ड्रिंक, मैगी, समोसे आदि खा सकते हैं। तथा वहाँ दूरबीन वालों की दूरबीन से दूर केदारनाथ और नीलकंठ शिखर, तिब्बत की सीमा को भी देख सकते हैं, जो मौसम पर निर्भर करता है, और चारों तरफ की सीनरी के लिए भी यह जगह अच्छी है। रिफ्रेश होने के लिए अच्छी जगह है।
शाम तक हम लगभग 6 बजे मसूरी पहुँच गए। हमारा होटल कुलरी बाजार, कैमल बैक रोड पर मसूरी में था। गाड़ी माल रोड से पहले ही रोककर एक तरफ खड़ी करनी पड़ी। वहाँ से पैदल, कुली की सहायता से, हम होटल दीप में अपना सामान लेकर पहुँच गए। सामान रखकर, थोड़ा आराम करके, हाथ-मुँह धोकर हम चल दिए माल रोड घूमने और रात का खाना खाने के लिए।
संवृद्धि रेस्टोरेंट पर पहाड़ी खाने की थाली में खाना खाया। मस्त, लाजवाब खाना है। घूमते-घूमते हम पहुँच गए कैम्ब्रिज बुक शॉप, जो माल रोड के आखिर में पड़ता है और लाइब्रेरी चौक से पहले है। अच्छी किताबों का कलेक्शन है, जहाँ रस्किन बॉन्ड भी कभी-कभी आते हैं। रात्रि का टहलना मसूरी में माल रोड पर घुमक्कड़ी का एक टुकड़ा है।
7 मार्च 2025 - मसूरी से यमुनोत्री मार्ग पर चलते ही मसूरी का मशहूर केंपटी फॉल पड़ता है। सड़क पर गाड़ी छोड़कर हम नीचे सीढ़ियाँ उतरकर पहुँच गए केंपटी फॉल, जहाँ झरने का पानी बहुत ऊँचाई, लगभग 4500 फीट, से गिरता है और बेहद खूबसूरत लगता है। यहाँ झरने के नीचे नहाने का आनंद ही कुछ और है। चेंजिंग रूम है, खाने-पीने की दुकानें हैं। (फोटो नीचे देखें।)
टेलीविज़न पर उत्तराखंड के लाखामंडल के बारे में कार्यक्रम देखा, जो कि महाभारत काल के पौराणिक प्रसंगों से जुड़ा हुआ है और दुर्योधन ने पांडवों और कुंती को जलाने के लिए लाक्षागृह का निर्माण करवाया था। इसी लिए इच्छा हुई कि उस पौराणिक स्थान को देखने चलते हैं और हम चल पड़े केंपटी फॉल से लाखामंडल की ओर, जो लगभग 60 किलोमीटर दूर होगा। पहाड़ों का शांत और मनोरम सफर, रास्ते में यमुना नदी भी पड़ती है। गाँव में पहुँचने पर कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर ही मंदिर है। महाभारत काल से जुड़ा हुआ मंदिर और आज भी कुछ अवशेष। युधिष्ठिर ने यहीं पर शिवजी की आराधना और पूजा की थी और वह शिवलिंग आज भी है। मंदिर का निर्माण नागर शैली में किया हुआ है और मंदिर के बाहर दो द्वारपाल भी हैं, जिन्हें मानव और दानव भी कहा जाता है, तो कोई इन्हें भगवान विष्णु के जय और विजय कहते हैं। मान्यता है कि मृत व्यक्ति की देह पर अगर पुजारी जी गंगाजल छिड़कें, तो वह कुछ समय के लिए पुनः जीवित हो जाता है और गंगाजल ग्रहण कर फिर उसकी आत्मा चली जाती है। (फोटो नीचे देखें।)
मंदिर के पंडित जी ने बताया कि यहाँ भूमि के नीचे एक लाख शिवलिंग हैं, जो कि बहुत प्राचीन समय के हैं। इस कारण से भी इसे लखामंडल कहते हैं। पंडित जी के परिवार का खाने का ढाबा ठीक सामने है, जहाँ बैठकर हमने सादा चपाती, चावल, दाल, सब्जी खाई। खाना सामने उनकी पत्नी ने बनाया था और उन्होंने बताया कि ऊपर उनके मायके में एक बहुत सुंदर शिव मंदिर है, जो लकड़ी का बना हुआ बहुत प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर है।
हम चल दिए लाखामंडल से भटाड़ गाँव के लिए, जो जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर में है और लगभग 10 किलोमीटर दूर है। रास्ता थोड़ा संकरा था, अतः चढ़ाई में डर लग रहा था। गाँव में पहुँचे तो देखा कि बाबा केदार का नया मंदिर प्राचीन मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है। देवदार की लकड़ी से पूरा मंदिर बनाया गया है और उस पर की गई नक्काशी, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, कलाकृतियाँ आपका मन मोह लेंगी। कहते हैं, यहाँ महाभारत काल में भीमसेन ने बाबा केदार के मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी। इसे आदि केदार मंदिर भी कहते हैं। (फोटो नीचे देखें।)
8 मार्च 2025 - सुबह-सुबह नाश्ता करके हम निकल गए सुरकंडा देवी मंदिर के दर्शन करने के लिए, जहाँ से रोपवे का टिकट लेकर हम ऊपर मंदिर पहुँच गए। आप पैदल भी चढ़ाई कर सकते हैं। मंदिर, जो लगभग 10,000 फीट की ऊँचाई पर है, से जो हिमालय का नज़ारा है, वह अलौकिक और बेहद आकर्षक है। मंदिर के शांति से दर्शन करके आप वहाँ बाहर कुछ देर बैठ सकते हैं। एक विदेशी महिला, जो यहाँ दर्शन के लिए आई थी, से पत्नी ने कुछ वार्तालाप किया और पता चला कि हमारे अध्यात्म से उनका गहरा जुड़ाव और लगाव है। कहते हैं, जब शिव जी माता पार्वती के पार्थिव शरीर को लेकर जा रहे थे, तो उनका सिर यहाँ पर गिरा था। अतः इस शक्तिपीठ का नाम सुरकंडा देवी पड़ा। (फोटो नीचे देखें।)
रास्ते में कनाताल आया, जो कि काफी उभरता हुआ पर्यटन स्थल है। निःसंदेह वहाँ का वन क्षेत्र (कोडिया इको पार्क) और ट्रैक मुझे बहुत अच्छा लगा। (फोटो नीचे देखें।) हम वहाँ बहुत ज्यादा समय नहीं बिता पाए। पेड़ों की जो कैनोपी बनती है, वह देखने लायक है। दुर्लभ पक्षियों को घने जंगल में देखना मनभावन है। (फोटो नीचे देखें।)
उसके बाद इस सुहाने सफर में हम चल पड़े टिहरी की ओर। चारों तरफ पहाड़, हरियाली, शुद्ध एवं ठंडी हवा। एक युग, एक संस्कृति की समाप्ति, टिहरी बाँध बनाने की वजह से मूल टिहरी को जल समाधि लेनी पड़ी और लोगों को नई टिहरी में बसाया गया। बहुत मुश्किल दौर और अपनी जमीन की पीड़ा। आज उसी जगह टिहरी झील है और एक टिहरी बाँध, जिससे उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली को बिजली की आपूर्ति होती है। इस टिहरी झील में वाटर स्पोर्ट्स का आयोजन होता है। हमने भी यहाँ पर बोटिंग का आनंद लिया। (फोटो नीचे देखें।)
9 मार्च 2025 -- सुबह-सुबह हमने अपना सारा सामान पैक किया और तय किया कि नाश्ता देहरादून में करेंगे। हम टैक्सी लेकर निकल पड़े। फिर लगभग 9 बजे के आसपास हम असली पप्पू ढाबे पर आ गए, जिसका खाना हमें अच्छा लगा था। उसके बाद पलटन बाजार के आसपास बेकरी का सामान घर के लिए लिया। फिर उसने हमें रोडवेज बस अड्डे पर छोड़ दिया, जहाँ से हमने रोडवेज की वोल्वो बस दिल्ली के लिए ली और घर को प्रस्थान किया।
चलिए दोस्तों, आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ जानी-पहचानी, कुछ अनजानी, कुछ सुनसान गलियों में, मोहल्लों में, एक नए शहर, नए देहात, नए कस्बे, नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ, यात्राओं के इस अनवरत सफर पर ।
आप मेरे नये और पुराने संस्मरणों के लिए मेरी वेबसाईट Galiyara07.com को विज़िट करे।
तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन।
Leave a comment
Your email address will not be published. Required fields are marked *






















