मेरे एक साथी वी. के. सिंघल जी से बात हुई तो पता चला कि अभी वो कश्मीर का ट्रिप करके आए हैं। पूरा वृतांत सुनने के बाद और कश्मीर की दीवानगी के बाद एकदम इरादा बना लिया घूमने का, हालांकि मैं दोस्तों के साथ एक बार लगभग 35 साल पहले कश्मीर गया था। सारी व्यवस्थाएँ जैसे फ्लाइट टिकट, होटल बुकिंग, टैक्सी बुकिंग, रोपवे बुकिंग आदि करने के बाद वहाँ के तापमान और मौसम को देखते हुए हम दोनों (सपत्नी) ने गरम कपड़े, टोपी, मफ़लर, गरम इनर, जैकेट सब रख लिया, ताकि यात्रा का पूरा आनंद ले सकें।
27 नवम्बर को लगभग 11 बजे हम फ्लाइट लेकर दिल्ली से श्रीनगर एयरपोर्ट पहुँच गए। छोटा एयरपोर्ट है, सो बाहर निकलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। बाहर शाबीर भाई अपनी टैक्सी लेकर मिल गए, जिससे हमने पहले ही फोन पर वहाँ के माहौल, सुरक्षा, मौसम, होटल सब चीजों की जानकारी लेकर पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तय कर ली थी। अतः उसने सीधा गाड़ी गुलमर्ग के लिए दौड़ा दी। क्योंकि हमने 1.30 बजे दोपहर के लिए गंडोला (रोपवे) की बुकिंग पहले ही करा रखी थी। शाबीर का व्यवहार सौहार्दपूर्ण और मिलनसार है, यह हमें थोड़ी दूर चलने पर ही पता चल गया। शाबीर हमें रास्तों की, खाने की, पहनावे की सारी छोटी-छोटी बातें बता रहा था, जो हमें उस माहौल में ढलने में मदद कर रहा था। जगह-जगह थोड़ी-थोड़ी दूर पर सुरक्षा पुलिस/गार्ड तैनात थे। शाबीर हमें बड़े चाव से बता रहा था कि यहाँ ‘बजरंगी भाईजान’ की शूटिंग हुई थी, तो कभी अमिताभ बच्चन की फिल्मों की जिनकी शूटिंग कश्मीर में हुई थी, तो कभी किसी और फिल्म की बातें बताता, कभी टूलिप गार्डन के बारे में हमारी जिज्ञासा शांत करता।
गुलमर्ग आने से पहले, टनमर्ग के आसपास शाबीर ने सुझाव दिया कि आप यहाँ से ओवरकोट, जूते, दस्ताने आदि किराये पर गुलमर्ग के लिए ले लीजिए। उसके ज्यादा अनुभव को ध्यान में रखते हुए हमने सामान ले लिया।
गुलमर्ग की शुरुआत बड़े होटलों से होती है। लगभग 35 साल पहले जब हम दोस्तों की टोली में आए थे, तब इतने होटल आदि याद नहीं हैं। उस समय हम श्रीनगर ही रुके थे और हमारे पास में ही एक स्टेट बैंक का हॉलिडे होम और कैंटीन थी, जहाँ हम सुबह का नाश्ता करके दोपहर के लिए पराँठे पैक करवा लेते थे और रोजाना का सफर करते थे। गुलमर्ग में कुछ दूर चलने पर आपको बाईं तरफ दूर खुले मैदान में एक मंदिर दिखाई देगा और आपको राजेश खन्ना और मुमताज़ के मशहूर गाने “जय जय शिव शंकर, कांटा लगे ना कंकर“ की याद आँखों के सामने आ जाएगी, जिसकी शूटिंग यहाँ हुई थी (फोटो नीचे देखे)।

हम लगभग एक बजे तक गंडोला (रोपवे) के स्टार्टिंग पॉइंट पर पहुँच गए। कहवा पीकर और टिकट चैक कराने के बाद हम अपनी बारी आने पर गंडोला में बैठ गए और यात्रा शुरू कर दी। देवदारों के पेड़ों के बीच, चारों तरफ बर्फ ही बर्फ, यह यात्रा कुछ और ही है, यह हमें महसूस हो गया था (फोटो नीचे देखें)।

हमने फेज 1 का ही टिकट लिया था। ऊपर पहुँचने के बाद जो नजारा देखा, वो बयान करना मुश्किल है। केवल बर्फ ही बर्फ, जहाँ तक नजर चली जाए, उस पर चलना, घूमना, बर्फ पर स्लेज का सफर और फिसलना, भयंकर सर्दी, बर्फ के गोलों से खेलना, फेज 2 जाता हुआ गंडोला देखना। सूरज की किरणें बर्फ पर पड़कर उसे निहायत खूबसूरत बना रही थीं, विस्तृत नीला आकाश और नीचे दूधिया बर्फ, जैसे किसी सफेद संगमरमर के ग्रह पर आ गए हों। गगनचुंबी सफेद पर्वतमालाओं की शृंखला जैसे नीले गगन से बात कर रही हो। (नीचे फोटो और वीडियो देखें)। हिंदुस्तान का ताज और सिर, जो सजग प्रहरी बनकर हर समय हमारी रक्षा करती रहती हैं।



कश्मीर में लोगों का व्यवहार बहुत आत्मीय और मदद वाला है, शायद उन्होंने पहाड़ों और बर्फ की शांति को दिल में आत्मसात कर लिया है। बर्फ पर पूरी मस्ती के बाद जोर की भूख लग रही थी, हमने वहाँ सादा दाल और रोटी ऑर्डर की, जो चने की दाल हम अपने यहाँ सामान्य समझकर कम खाते हैं, वो इतनी स्वादिष्ट लग सकती है, वो खाने के बाद पता चला। वापस गंडोला से उतरते हुए मुझे अचानक पैंतीस साल पहले का गुलमर्ग याद आ गया। मन के किसी कोने में आज भी वो खुला सामान्य केबल वाला, केवल दो जनों के लिए बैठने वाला और अपनी सुरक्षा के लिए बीच में लगे लोहे के डंडे को पकड़ने वाला रोपवे याद है, मौसम हल्की बर्फ गिरने वाला और गीला था, ऊपर से नीचे देखे तो बर्फ ही बर्फ और संभावित दुर्घटना के ख्याल से ही मन खौफ से भर जाए, दूर दिखता हुआ बॉबी हट, जिसमें “हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाबी खो जाए” की शूटिंग हुई थी, जैसे कोई फिल्म फ्लैशबैक में चली जाती है, ऐसे ही दोस्तों के साथ का वो पुराने रोपवे का मंजर आँखों के सामने आ गया और कितना खतरनाक था वो रोपवे बर्फ के बीच में। शाबीर से बात करके उस पुराने रोपवे की तस्वीर मँगवाई है (नीचे देखें, कैसा था वो रोपवे)।

गुलमर्ग में ही आसपास के नजारों का लुत्फ लेने के बाद लौटकर शाम को हम गुलमर्ग में अपने होटल में आ गए। होटल के चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी और ठंड बढ़ती जा रही थी। शाबीर पहले ही होटल आकर देख गया था और उसने हमें फोन पर पहले ही बता दिया था कि होटल सही है और खुले में है। तब हमने होटल ऑनलाइन बुक कर दिया था। कश्मीर में होटलों में एयरकंडिशनर, हॉट ब्लोअर वाले हैं, ताकि सर्दियों में अलग से रूम हीटर न लगाने पड़े। होटल में चेक इन करने के बाद उन्होंने ब्लोअर चला दिए और इलेक्ट्रिक कंबल भी दे दिए।

28 नवम्बर 2022
सुबह उठने के बाद होटल के बाहर का नजारा बहुत शांत और मनोरम था। हम दोनों ने बाहर निकलकर खुले में ऊँचे सीमेंट के पत्थर पर बैठकर, चारों तरफ बर्फ के बीच, एकाग्रचित्त होकर प्राणायाम किया तो मन आनंदित हो गया। विशाल बर्फ से ढके पहाड़, अटल, स्थिर और मौन, जीवन का यहीं संदेश बिखरते हुए कि यही तीन आपको जीवन की हर स्थिति में उबार लेंगे। वहाँ के पशुधन (डॉगी) पर भी मानव स्वभाव और पहाड़ों का असर दिख रहा था, शांत और आपके साथ हो लेंगे। नाश्ता वगैरह करके हम निकल गए पुराने रोपवे के अवशेष और बॉबी हाउस, जो कि होटल हाईलेंड पार्क में है, को देखने और हम उसे दूर से देखते हुए पहलगाम की ओर चल पड़े। (फोटो नीचे देखें)

हसीन वादियों की पतझड़ की खूबसूरती को निहारते हुए हम आगे बढ़ रहे थे। बीच में जब सर्दी ज्यादा लग रही थी तो एक जगह रुक कर कहवा पिया और साथ में श्रीमल (स्थानीय बेक्ड ब्रेड) खाया, थकावट एकदम दूर हो गई। शाबीर से ही पता चला कि कश्मीर में बेक्ड ब्रेड की बहुत-सी वैरायटी हैं।
दोपहर का खाना बीच में लिया तो इस बार चने की दाल (जबकि दिल्ली में येलो दाल – अरहर की और दाल मखनी चलती हैं) के साथ पालक पनीर भी ले लिया, इस बार भी खाना बहुत स्वादिष्ट लगा। लगभग चार बजे पहलगाम के मार्केट को पार करके हम JKTDC के अपने होटल के विशाल और खुले कम्पाउंड में प्रवेश कर गए, जहाँ शुरू में दाहिनी तरफ JKTDC के खूबसूरत कॉटेज/हट हैं। थोड़ा सा आगे चलकर बाईं तरफ रिसेप्शन और होटल के कमरे हैं। JKTDC का पहलगाम का यह होटल हमने आने से पहले ही बुक कर दिया था और जिस पर ऑफ सीजन का डिस्काउंट भी था।

शानदार खुले प्रांगण में, बड़े-बड़े खुले कमरे और पीछे की तरफ कल-कल बहती हुई लिद्दर नदी, जिसकी सायँ-सायँ आवाज, जो मंजर को बेहद खुशगवार बना रही थी, मंद-मंद शीत समीर, नदी के उस पार पहाड़ियाँ, सर्दी से बचने के लिए जैकेट की जेबों में गर्माहट के लिए हाथ डाले रहना, किनारे पर खुले घास के मैदान में लकड़ी की बेंचों पर बैठने का एक अलग लुत्फ दे रही थीं, आपका मन करेगा कि इन बर्फीली वादियों में खो जाएँ। (फोटो नीचे देखें)

11. पहलगाम का जेकेटीडीसी होटल का कॅम्पस और पीछे बेंच पर
हिन्दी फिल्मों के लिए एक जाना-पहचाना नाम – पहलगाम। शाम को होटल से बाहर आकर शांति से मार्केट में पैदल घूम सकते हैं और खरीदारी कर सकते हैं। कुछ कश्मीरी लोग शॉल वगैरह कंधे पर रखकर बेचते हुए भी मिल जाएँगे। हमने भी उनसे शॉल खरीद ली। रात को कड़कड़ाती ठंड में हमें होटल के कमरे में यहाँ भी इलेक्ट्रिक ब्लैंकेट लेने पड़े, क्योंकि खुले कमरे में सर्दी ऐसी-तैसी कर रही थी।

12 . पहलगाम जेकेटीडीसी होटल के पीछे बहती लिद्दर नदी
29 नवम्बर 2022
अगले दिन सुबह हम चाय वगैरह पीकर निकल गए घूमने के लिए। शाबीर हमें ले गया चंदनबाड़ी, जहाँ तक टैक्सी चली जाती है और जहाँ पहलगाम से अमरनाथ की तरफ जाने वाले यात्री पैदल यात्रा शुरू करते हैं। कभी चहल-पहल से भरी रहने वाली इस भीड़ वाली जगह पर सुबह-सुबह एकदम सन्नाटा और तेज ठंड थी। हमने यहीं पर मत्था टेककर उस अनंत निराकार ब्रह्म को प्रणाम किया। एक अलग सी निस्तब्ध अनुभूति, एक अलग सी शांति आपको यहाँ महसूस होगी। (फोटो नीचे देखें)

यहाँ से हम चल पड़े बेताब वैली के लिए, जो मशहूर फिल्म बेताब के लिए जानी जाती है। लिद्दर नदी के साथ-साथ चलती बेताब घाटी को देखकर आप कहेंगे कि सचमुच फिल्म के लिए इसका चुनाव सराहनीय कदम था। पहाड़ी डॉग हमारे साथ-साथ चल पड़ा। खूबसूरत नजारे, खूबसूरत वादियाँ, बीच में खनकती हुई नदी का तेज प्रवाह, हाथों और जिस्म को झकझोरती सर्दी और उससे बचने के लिए हमने गरमा-गरम चाय और पकौड़े के लिए ढाबे वाले को बोल दिया, जो अभी ढाबे को खोलकर अपना सामान लगा ही रहा था। शायद सर्दियों में हिंदुस्तानियों को एक यह चीज भी शांति और सुकून प्रदान करती है (फोटो नीचे देखें) ।

इस खूबसूरत वादी के बाद हम चल पड़े ममलेश्वर मंदिर की ओर, जो चौथी शताब्दी का ऐतिहासिक और पौराणिक मंदिर है। कहते हैं यहाँ माँ पार्वती ने स्नान करने से पहले गणेश जी को द्वारपाल नियुक्त किया और किसी को भी अंदर न आने देने के लिए बोला था। इसी इनकार से क्रोधित होकर शिव जी ने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया और उन्हें हाथी का सिर प्रदान किया। मंदिर में एक शिवलिंग है। (फोटो नीचे देखें)

15. ममलेश्वर मंदिर
दर्शन करने के बाद हम चल पड़े कुछ और खूबसूरत वादियों की सैर के लिए, इतनी मनमोहक और दिलकश वादियों को देखकर आपको लगेगा कि कुछ लम्हे यहाँ और बिताए जाएँ। यहाँ आप आरु वैली और बैसरण वैली भी घूम सकते हैं, जो हम समयाभाव की वजह से नहीं जा पाए। पहलगाम की ठंडी खूबसूरती को आँखों में समेटे हुए हम चल पड़े यात्रा के अंतिम पड़ाव यानी श्रीनगर की तरफ।

16. पहलगाम की बर्फीली वादियाँ
इस यात्रा में जितना लुत्फ, जितना आनंद आपको तीनों पड़ाव की जगहों – गुलमर्ग, पहलगाम और श्रीनगर – को देखने में आएगा, उतना ही आपको इन तीनों के बीच के सफर की यात्रा में आएगा। खुशगवार मौसम में हसीन वादियों का सफर पहाड़ों, झरनों, नदियों/धाराओं की वजह से मदमस्त लग रहा था। बीच-बीच में सेवों के बाग भी दिखाई दे रहे थे (फोटो नीचे देखें)।

17. रास्ते में आने वाले पतझड़ में सेवों के बाग
पहलगाम के रास्ते में हमें बिजबेहरा पड़ा। शाबीर ने बताया यहाँ के बेकरी प्रोडक्ट्स काफी मशहूर हैं, निःसन्देह कश्मीर की यह चीज अलग है बनाने के लिए इस्तेमाल की जानी वाली चीजों की वजह से और बनाने की विधि की वजह से और वादी के मौसम की वजह से, मगर कुछ खास है इसमें, जो खाकर पता चलता है। उसके बाद रास्ते में अवन्तिपोरा भी पड़ता है, जो ऐतिहासिक और हिन्दू प्राचीन धार्मिक अवशेषों के लिए विख्यात है और दर्शनीय है। श्रीनगर में अपने होटल में जाने की बजाय, चूँकि अभी समय था, तो हम पहले वहाँ के मशहूर गार्डन शालीमार बाग में घूमने के लिए निकल पड़े। गार्डन के बाहर आपको काँगड़ी (सिगड़ी) पर हल्के-हल्के पकता हुआ गरम-गरम कहवा आराम से मिल जाएगा और इस सर्दी में सुकून और स्वाद देगा। पतझड़ में मशहूर बागों में वो रौनक नहीं होती है जो खुशनुमा मौसम में होती है, परंतु इसी पतझड़ में आप चिनार के सुर्ख लाल, पीले और सुनहरे पत्तों के दीदार कर सकते हैं, जो आपको किसी और सीजन में नहीं मिलेंगे। आपको देखकर लगेगा कि किसी स्वर्ण-जड़ित मुकुट या छतरी के नीचे कोई सोने का बिछौना है। (नीचे फोटो देखें)

18. चिनार का पतझड़
या फिर आपको याद आएगा :-
“कभी हम साथ गुजरे जिन सजीली राहगुजारों से, खिजा के भेष में गिरते हैं अब पत्ते चनारों से, ये राहें याद करती हैं, यह गुलशन याद करता है”
(फिल्म – आरजू, नायिका – साधना)
कश्मीर चार मौसम की बजाय 12 महीनों के 12 दीदार लिए हुए होता है, यह कहना भी कम होगा, सचमुच ही जन्नत है। घूम-फिर कर शाम को हम होटल आ गए, जो स्टेट बैंक के मेरे बचपन के साथी की मदद से राजबाग, श्रीनगर के पास बुक हुआ था।
30 नवम्बर 2022
रात्रि विश्राम के बाद और सुबह का नाश्ता करने के बाद, हम सुबह-सुबह चल दिए श्रीनगर के मशहूर शंकराचार्य जी के मंदिर को देखने, जो कि एक पहाड़ की चोटी पर स्थित है और जहाँ आदि गुरु शंकराचार्य जी ने तपस्या की थी। लगभग 240 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद छोटे से मंदिर में शिवलिंग की पूजा होती है, जो आपकी भावनाओं को सीधा अध्यात्म से जोड़ देगी। पहाड़ी से श्रीनगर का नजारा बिल्कुल जुदा और अद्भुत है।

19. शंकराचार्य जी का मंदिर , श्री नगर
वहाँ से निकलकर हम बाकी बचे हुए बागों में घूमने के लिए निकल गए, जैसे परी महल, शालीमार गार्डन, निशात गार्डन। (फोटो नीचे देखें)


20,21,22 – पतझड़ में कश्मीर के मुग़ल गार्डन
फिर डल झील के किनारे आकर शिकारे के सफर पर चल दिए। आपको इस जल यात्रा में पता चलेगा कि दूसरे शिकारों पर पूरी मार्केट लगी हुई है, जहाँ से आप यात्रा के दौरान ही मनपसंद चीजें यहाँ से यादों के बतौर ले जा सकते हैं। शिकारों के बीच से निकलता हुआ आपका अपना शिकारा, चारों तरफ बर्फ के पहाड़, इस यात्रा को खुश-मंजर एवं अविस्मरणीय बना देता है और शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर की ‘कश्मीर की कली’ फिल्म के शिकारों की याद आ जाएगी। डल झील के किनारे बने हुए आरामदायक विश्राम स्थल और उनके अंदर की नक्काशी मंत्रमुग्ध कर देगी और आप यहाँ से डल झील के नजारों को पहाड़ों के साथ निहार सकते हैं। (फोटो नीचे देखें)

उसके बाद हम ड्राई फ्रूट मार्केट से अखरोट, बादाम, कहवा, कश्मीरी साबुत मिर्च लेने के लिए निकल गए। शाम को होटल आकर थोड़ा विश्राम करके हम निकल गए श्रीनगर के मशहूर लाल चौक, जहाँ मार्केट भी लगती है और दुकानें भी हैं और जहाँ से आप गरम कपड़े, पशमीना शॉल, कोट, टोपी, कश्मीरी फेरेन आदि ले सकते हैं और घूम सकते हैं। फिर रात्रि विश्राम के लिए होटल आ गए।
1 दिसंबर 2022
अपना सारा सामान पैक करके हम श्रीनगर एयरपोर्ट के लिए निकल गए। शाबीर का इस यादगार यात्रा के लिए धन्यवाद किया और बख्शीश दी। चूँकि एयरपोर्ट छोटा है, अतः खचाखच भरा हुआ था, परन्तु चेक-इन में काफी कम समय लगता है। विमान कश्मीर को अलविदा कहता हुआ चल पड़ा। हवाईजहाज से नीचे का नजारा – चारों तरफ दूर तक बर्फ की चादरों से लदे हुए पहाड़ सलामी देते हुए और कहते हुए कि अभी अलविदा न कहना। विदाई की ऐसी घड़ी मैंने किसी यात्रा में नहीं देखी, हवाईजहाज से ऐसे दिलकश नजारे, जिन्हें आप ताउम्र नहीं भूल पाएँगे(फोटो नीचे देखें)।

लगभग 35 साल पहले जम्मू से श्रीनगर की यात्रा बस से की थी और इस बार दिल्ली से श्रीनगर फ्लाइट से, मन है कि अगली यात्रा जम्मू से श्रीनगर वन्दे भारत ट्रेन से की जाए। पतझड़ में गुलमर्ग, पहलगाम और श्रीनगर का यह रंग बिल्कुल जुदा था और कभी भी न भूलने वाला भी, फिर आने की आस लिए हुए हम चल दिए।
चलिए दोस्तों, आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ जानी-पहचानी, कुछ अनजानी, कुछ सुनसान गलियों में, मोहल्लों में, एक नए शहर, नए देहात, नए कस्बे, नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ, यात्राओं के इस अनवरत सफर पर ।
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तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन।
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